‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है

विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

गीत : आज बंधे दो मन एक डोर में

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 1 (स्त्री स्वर)
अजनबी थे हम कल तक
आज साथी इस जीवन
माथे की इस सिंदूरी रेखा में
मेरे सपने होकर सजते हो

नयनों में रूप तुम्हारा
होंठों पे तू ही मुस्कान
मन ही मन स्वीकार किया
तुम्हें मैंने अपना प्राण 

अंतरा 2 (पुरुष स्वर)
पहली बार जब देखा तुम्हें
मन ठहर-सा गया
तेरी पायल की धुन से
तन मन हर्षित हो गया

कंगन की खनक सुन मन कहता है
हर सुख-दुख मैं हर पल साथ रहूँ
तेरी हँसी, तेरी आँखों में ही
अपना पूरा संसार कहूँ

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 3 (युगल धीमी लय)
तुम मेरे मन का श्रृंगार बनो
मैं तुम्हारी धीरज बन जाऊँ
तन से पहले मन मिल जाए
ऐसा प्रेम विधान निभाऊँ

मर्यादा मेरी भूषण हो
श्रद्धा मेरी पहचान
संग-संग चलकर रच देंगे
स्नेह, समर्पण, सम्मान

अंतरा 4 (स्त्री)
मेरी चूड़ी, मेरी बिंदी
तुम्हारे नाम सजी
तुम्हारी एक दृष्टि में ही
मेरी दुनिया बस गई

अंतरा 5 (पुरुष)
तेरी लाज मेरी मर्यादा
तेरी खुशी मेरा मान
जीवन भर का वचन यही
तू मेरा अभिमान

अंतिम मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में


मेरे गांव में

बेजाकब्जा का दौर
बेजाकब्जा का दौर
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
अंतरा 1
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
बेजाकब्जा का दौर,
किसी को किसी का कहां डर 
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 2
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
बच्चे खेल खेलें कहां अब
गली आँगन उजड़ गया
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 3
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
बेजाकब्जा का दौर,
गोचर ही हो गया खेत
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 4
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
बेजाकब्जा का दौर,
नदियों का कल-कल मौन
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 5
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बेजाकब्जा का दौर,
खो गई जीवन की मस्ती
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 6
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली 
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली
बेजाकब्जा का दौर,
बचे न कहीं भूमि खाली
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

मुखड़ा (दोहराव)
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे  बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

मेरे मोहल्ले की वह गली,
जिसकी चौड़ी थी छाती ।
जहां खड़ी होती थी 
एक साथ चार-चार बैलगाड़ी
सकरी संकल सा राह पर
ढूंढ नहीं पा रहा उसे मैं अनाड़ी 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

जहां हम सब खेला करते
दांव पेच हुंकार भरते 
मेरी गौ का गोचर भूमि 
और गौठान मेरे गांव   
ढूंढ रहा मैं डगर-डगर
लेकर अपनी यादों की छांव ।

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

नदी का वह  कल-कल पानी 
तालाब का लहरता रवानी 
मेरी मां का वह पनघट
और घाट-बाट का खटपट 
ढूंढ रहा मैं होकर आकुल
आहें लंबी और मन व्याकुल 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

लालच लोभ लोगों पर
पांव से सिर तक चढ़ा 
इंच-इंच जमीन डकार कर
दोष सरकार पर मढ़ा 
बड़ा है हर भ्रष्टाचार से 
मन क्षुब्ध हैं ऐसे व्यवहार से

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 


अटल बिहारी वाजपेई

अटल अटल है आपका, ध्रुव तरा सा नाम ।
बोल रहा हर गांव में,  पहुंच सड़क का काम ।।

जोड़ दिए हर गांव को, मुख्य सड़क के साथ।
गांव शहर से  जब जुड़ा, कारज आया हाथ ।

बदल दिया जीवन जगत,  देकर हमें विचार ।
आम लोग भी खाश हैं,  दिए अटल आचार ।।

लोकतंत्र का ध्येय जब, था धूसर तम श्याम।
अंत्योदय का नाद कर, अटल किए निजी काम ।।

स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, गढ़ा देश का साख।
दम्भ पोखरण का अटल,  केवल था नहिं राख ।।



शिक्षा: एक अच्छा नौकर है, मालिक नहीं

 



हमने विज्ञान का निबंध

रटा था,

विज्ञान एक अच्छा नौकर है,

मालिक नहीं


आज एक समाचार पढ़ा

एक मेजर के तीन लड़के थे

खूब-पढ़ाया लिखाया

ऐशों आराम दौलत थमाया


समय चक्र चलता गया,

मेजर की पत्नी चल बसी

बेटे पत्नियों से युक्त

मेजर बूढ़ा हो चला


हाथ-पैर असक्‍त

जुबान बंद

वह बिस्तर का 

कैदी रह गया 


धन का कमी था नहीं

बेटे बाप को 

नौकर भरोसे छोड़

विदेश चले गए

मेजर के बेटे होने का

रौब दिखाते हुए


नौकर भला इंसान

सेवा करता नित

बिस्तर के कैदी का


एक दिन नौकर

गया बाजार

खरीदने मेजर के लिए

जरुरी सामान


पर नियति ने

उसे ठोकर मारी

दुर्घटना में वह

दुनिया को कह गया

अलविदा


मेजर बिस्तर का कैदी

बंद कमरे में

बंद हो गया

बंद हो गई

उसकी जीवन लीला


महीनों बाद

बेटे लौटे

विदेश के सैर से

कंकाल पड़ा मिला

बाप का नहीं

मेजर का

मेजर के बेटों को


न जाने

ऐसे कितने

माँ-बाप

मरते रहे हैं

मरते रहेंगे


संतानों को

पढ़ा-लिखा कर,

साहब बना कर

अपने सुख चैन

अपनी जिंदगी

गंवाकर


यह शिक्षा

कान्वेंट का

साहब बनाने,

बच्चों को 

धनवान बनाने

भौतिकता के पीछे

नैतिकता खोकर

भाग जाने का

एक अच्‍छा मालिक

हो नहीं सकता

विज्ञान की तरह


मुखौटा


उनके चेहरे पर

महीन मुख श्रृंगारक लेप सा,

भावों और विचारों का

है अदृश्‍य मुखौटा



मानवतावादी और सेक्‍युलर

कहलाने वाले चेहरों को

मैं जब गौर से देखा,

उनके चेहरे पर

पानी उलेड़ा 

तो मैंने पाया

न मानवतावादी मानवतावादी है

न ही सेक्‍युलर, सेक्‍युलर


अपने विचारों के

स्वजाति बंधुओं को ही

वे समझते हैं मानव

सेक्‍युलर भी 

विचार और आस्था से भिन्‍न

प्राणियों को मानव

कहां समझते हैं ?


अपने विचारों को

जहां,जिस पर पल्‍लवित पाया

वहां की घटनाएं

बलत्‍कार, अत्‍चार पर

शोर करते 

चिखते चिल्‍लाते हैं,

बाकी पर

गूंगे, बहरे और अंधे का

किरदार निभाते हैं

एक सफल 

अभिनेता की भांति


लकड़ी के खंभे

पत्थर के चबूतरे पर

वस्त्रों की बर्बादी

देख न पाने वाले

मूर्ति और दूध पर

सवाल उठाते हैं


जन्‍म से बनी जाति को

समूल नष्ट करने जो

मुखर दिखते हैं

अपनी ही जाति को

जीवित रखने

अनेक संगठन

खड़े कर रखे हैं

चौपाल लगाकर

सरकार को डरा कर

मांग रहे हैं 

केवल और केवल

अपने लिए

सुविधाएं

आरक्षण की बैसाखी


सेक्‍युलर को

देखना क्यों पड़ता है ?

पूछना क्यों पड़ता है ?

मानना क्यों पड़ता है ?

किसी का धर्म और पंथ


सेक्युलर देश में

सरकारी पर्चो पर

क्यों जीवित है  ?

धर्म और जाति का

वह कॉलम


केवल राजनेताओं के नहीं,

न ही अभिनेताओं के

बुद्धिजीवियों के

चेहरों पर भी

मुझे दिखते हैं मुखौटे ।


चिंता या चिंतन

अनसुनी बातें 
सुनता रहा मैं 
अनकही बातें 
कहता रहा मैं 
अनदेखी 
दृश्य को देखकर ।

विचारों की तंतु
मन विबर की लार्वा से
तनता जा रहा था
उलझता-सुलझता हुआ
मन को हृदय की 
गहराई में देखकर ।।

चिंता और चिंतन 
गाहे-बगाहे साथ हो चले
नैतिकता का दर्पण में
अंकित छवि को देखकर ।।

आ लौट चलें

 आ लौट चलें,

चकाचौंध से, दृश्य प्रकाश पर
शोर-गुल से, श्रव्य ध्वनि पर
सपनों की निद्रा से, भोर उजास पर
आखिर शाखाओं का अस्तित्व मूल से तो ही है ।

लौट चलें
गगन की ऊँचाई से, धरा धरातल पर
सागर की गहराई से, अवलंब भू तट पर
शून्य तम अंधियारे से, टिमटिमाते लौ के हद पर
आखिर मन के पर को भी थाह चाहिए यथार्थ का ।।

आ लौट चलें
दूसरों के कंधों से, अपने पैरों पर
रील लाइफ से, रीयल लाइफ पर
आखिर कभी न कभी
कास्टूम उतार कर, मेकअप धोना होगा

आ लौट चलें
प्रदूषण के धूंध से, विरल वायु में
कांक्रिट के पहाड़ों से, नर्म धूसर धूल पर
कटिले दंतैल बंजर से, उर्वर सौंधी माटी पर
आखिर बीज को पौधा होने के लिए मिट्टी ही चाहिए

आ लौट चलें
प्रदर्शनीय के टंगे शब्दों से, अपनी बोली पर
झूठ से सने रसगुल्ले की मीठास से, सत्य के कड़वे नीम पर
अपनी प्रकृति, अपना संस्कार, अपना व्यवहार
सनातन था, सनातन है, सनातन ही रहेगा
-रमेश चौहान

ओम

भोले बाबा शंभु हर,  हर-हर शंकर ओम ।
बोल बम्ब की नाद से, गूंज रहा है व्योम ।।
गूंज रहा है व्योम, बम्ब भोले का नारा ।
बोल बम्ब जयकार, लगे भक्तों को प्यारा ।।
कांवर लेकर कांध,  राह पर भगतन बोले ।
करें कामना पूर्ण, शंभु शिव बाबा भोले ।।


आग लगी पेट्रोल पर (दोहागीत)

आग लगी पेट्रोल पर, धधक रहा है देश ।

राज्य, केन्द्र सरकार को, तनिक नहीं है क्लेश ।।


मँहगाई छूये गगन, जमीदोज है आय ।

जनता अपनी पीर को, कैसे किसे बताय ।।

राज व्यपारी का दिखे, नेता भी अलकेश ।

आग लगी पेट्रोल पर, धधक रहा है देश ।

(अलकेश-कुबेर)


राज्य कहे है केन्द से, और केन्द्र तो राज्य ।

कंदुक के इस खेल का, केवल दिखे सम्राज्य ।।

इसका करें निदान अब, तज नाहक उपदेश ।

आग लगी पेट्रोल पर, धधक रहा है देश ।।


तिल-तिल है दिल जल रहा, जले रसोई गैस ।

खाद्य तेल सब्जी सभी, दिखा रहे हैं टैस ।।

मँहगाई के उत्पात से, जनता है निर्वेश ।

आग लगी पेट्रोल पर, धधक रहा है देश ।।


अटल अटल ना रह सका, उछले थे जब प्याज ।

मँहगाई के मूल्य का, बचा रहेगा ब्याज ।।

कर लो सोच विचार अब, हो जो आप प्रजेश ।

आग लगी पेट्रोल पर, धधक रहा है देश ।।


अँकुश व्‍यपारी पर नहीं

 जनता मेरे देश का, दिखे विवश लाचार ।

अँकुश व्‍यपारी पर नहीं, सौ का लिए हजार ।।

सौ का लिए हजार, सभी लघु दीर्घ व्‍यपारी ।

लाभ नीति हो एक, देश में अब सरकारी ।।

कितना लागत मूल्‍य,  बिक्री का कितना तेरे ।

ध्‍यान रखें सरकार,  विवश हैं जनता मेरे ।। 


सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में

आज करवा चौथ पर अपनी अर्धांगिनी के प्रति उद्गार-


सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।
जिनगी तेरी खप गई, केवल मेरे प्यार में ।।

जब से आई ब्याह कर, मुझ पर मरती रह गई।
जीवन कष्टों को प्रिये, हॅंसते -हॅंसते सह गई ।।
शक्कर जैसे घुल गई, तू मेरे परिवार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

भोर भये से रात तक, कारज तेरा एक है ।
घर यह मेरा घर रहे, चाहत तेरी नेक है ।।
सास-ससुर भी तृप्त हो, मेरे इस घर-द्वार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

देवर तेरे बंधु सम,  और देवरानी बहन ।
हिलमिल रहती साथ में, ज्यों माला की हो सुमन ।।
टूटे बिखरे तुम नहीं, नाहक के तकरार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

बच्चों का पालन किए, ज्यों जीवन का खेल हो ।
काम किए ऐसे प्रिये, नातों का खुद से मेल हो ।।
तेरे सोच विचार से, सभी गुॅंथे संस्कार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

अपनी बातें क्या कहूॅं,  मैं तो तेरा प्राण हूॅं ।
जीवन के दुष्कर डगर, हंसी खुशी का तान हूॅं ।।
ऐसा कहती मौन हो, अंखियों के सत्कार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

मेरे प्रति उपवास है, श्रद्धा और विश्वास से ।
करे कामना एक ही, जीवन भरे उजास से ।।
प्रेम छोड़ कर कुछ नहीं, देने को उपहार में ।
सजनी तेरे प्यार का, मोल नहीं संसार में ।।

-रमेश चौहान

नारी का बहू रूप

 नारी का बहू रूप


नारी नाना रूप में, बहू रूप में सार । 

मां तो बस संतान की, पत्नी का पति प्यार । 

पत्नी का पति प्यार, मात्र पति को घर जाने । 

बेटी पन का भाव, मायका बस को माने ।। 

सास-ससुर परिवार, बहू करती रखवारी । 

बहू मूल आधार, समझ लो हर नर नारी ।।


नर के सारे काम में, दक्ष हुई अब नार ।
नारी के हर काम को, करने नर तैयार ।।
करने नर तैयार, काम में अंतर कैसे ।
गढ़ना घर परिवार, पुरुष ना नारी जैसे ।
सुन लो कहे 'रमेश', सभी नारी घर के ।
महिला से परिवार, नहीं हो सकता नर के ।।

जनता जनार्दन !

जनता जनार्दन !

वाह करते

वाह करते है लोग

नेताओं पर

जब कटाक्ष होवे

व्यवस्थाओं की

कलाई खोली जाए

वही जनता 

बंद कर लेते हैं

आँख, कान व मुॅंह

अपनी गलती में

क्या ऐ जनता

व्यवस्था का अंग है?

लोकतंत्र में

नेताओं का जनक?

खुद सुधरेंगे

व्यवस्था सुधरेगी

खुद से प्रश्न

पूछिए भला आप

भ्रष्टाचार लौ

धधकाया नहीं है

आहुति डाल

नियम खूंटी टांग

काम नहीं किए हो

सेंध लगाए

सरकारी योजना

नहीं डकारे

सकरी गली

किसके कारण हैं

नदी-नालों का

डगर कौन रोके

कुॅंआ-बावली

घासभूमि तालब

कहां लुप्त है

जंगल और खेत

किसके घर

लाख उपाय ढूँढ़े

टैक्स बचाने

कमर कस कर

तैयार कौन?

व्यवस्था को हराने

अकेले नेता?

केवल कर्मचारी??

जनता जनार्दन !


मन की आकांक्षा

मन की आकांक्षा
(चौपाई)



अधिकारों से कर्तव्य बड़ा । जिस पर जड़ चेतन जीव खड़ा

धर्म नहीं हर कर्म अमर है । मौत क्या यह जीवन समर है


जीवन को हम सरल बनायें । चुनौतियों को विरल बनायें

नयनों में क्यों नीर बहायें । दृग को पहरेदार बनाये


देह नहीं मन को दुख होता । नयन नहीं अंतस ही रोता

मन चाहे तो दुख सुख होवे । मन चाहे तो सुख में रोवे


कष्टों से माँ शिशु जनती है । पर मन में तो सुख पलती है

दुखद विदाई बेटी का पर । दृग छलकें खुशियां धर


पीर देह की नहिं मन की गति । मन में यदि चिर-नूतन मति

मन की आकांक्षा वह कारक । मन की मति सुख-दुख धारक


-रमेश चौहान


कोराेना का रोना

 कोरोना का रोना
(कुण्‍डलियॉं)



कोरोना का है कहर , कंपित कुंठित लोग ।

सामाजिकता दांव पर, ऐसे व्यापे रोग ।

ऐसे व्यापे रोग, लोग कैदी निज घर में ।

मन में पले तनाव, आज हर नारी नर में ।।

सुन लो कहे रमेश, चार दिन का यह रोना ।

धरो धीर विश्वास, नष्ट होगा कोरोना ।


तन से दूरी राखिये, मन से दूरी नाहिं ।

मन से दूरी होय जब, मन से प्रीत नसाहिं ।

मन से प्रीत नसाहिं,  अगर कुछ ना बाेलो गे ।

करे न तुम से बात, तुमहिं सोचो क्‍या तौलो गे ।

सुन लो कहे 'रमेश', चाहिए साथी मन से ।

किया करें जी फोन, भले दूरी हो तन से ।।


घृणा रोग से कीजिये, रोगी से तो नाहिं ।

रोगी को संबल मिलत, रोग देह से जाहिं ।

रोग देह से जाहिं, हौसला जरा बढ़ायें ।

देकर हिम्‍मत धैर्य, आत्‍म विश्‍वास जगायें ।।

सुन लो कहे रमेश, जोड़ भावना लोग से ।

दें रोगी को साथ, घृण हो भले रोग से ।।

-रमेश चौहान

राष्ट्रधर्म ही धर्म बड़ा है

राष्ट्र धर्म ही  धर्म बड़ा है
(सरसी छंद)


राष्ट्र धर्म ही  धर्म बड़ा है, राष्ट्रप्रेम ही प्रेम ।
राष्ट्र हेतु ही चिंतन करना, हो जनता का नेम ।

राष्ट्र हेतु केवल मरना ही, नहीं है देश भक्ति ।
राष्ट्रहित जीवन जीने को, चाहिए बड़ी शक्ति ।

कर्तव्यों से बड़ा नहीं है, अधिकारों की बात ।
कर्तव्यों में सना हुआ है, मानवीय सौगात ।

अधिकारों का अतिक्रमण भी, कर जाता अधिकार ।
पर कर्तव्य तो बांट रहा है , सहिष्णुता का प्यार ।

राष्ट्रवाद पर एतराज क्यों, और क्यों राजनीति ।
राष्ट्रवाद ही राष्ट्र धर्म है, लोकतंत्र की नीति ।।

राष्ट्रवाद ही एक कसौटी, होवे जब इस देश ।
नहीं रहेंगे भ्रष्टाचारी, मिट जाएंगे क्लेश ।।

-रमेश चौहान

सोच रखिये चिर-नूतन (नववर्ष की शुभकामना)

सोच रखिये चिर-नूतन
(कुण्‍डलियॉं)

नववर्ष की शुभकामना

 नित नव नूतन नवकिरण, दिनकर का उपहार ।

भीनी-भीनी भोर से, जाग उठा संसार ।।

जाग उठा संसार, खुशी नूतन मन भरने ।

नयन नयापन नाप, करे उद्यम दुख हरने ।।

सुन लो कहे ‘रमेश’, सोच रखिये चिर-नूतन ।

वही धरा नभ सूर्य, नहीं कुछ नित नव नूतन ।।


कैसे पढ़ा-लिखा खुद को बतलाऊँ

 

कैसे पढ़ा-लिखा खुद को बतलाऊँ
(चौपाई छंद)


पढ़-लिख कर मैंने क्‍या पाया ।
डिग्री ले खुद को भरमाया ।।
काम-धाम मुझको ना आया ।
केवल दर-दर भटका खाया ।।

फेल हुये थे जो सहपाठी ।
आज धनिक हैं धन की थाती ।
सेठ बने हैं बने चहेता ।
अनपढ़ भी है देखो नेता ।।

श्रम करने जिसको है आता ।
दुनिया केवल उसको भाता ।।
बचपन से मैं बस्‍ता ढोया ।
काम हुुुुनर मैं हाथ न बोया ।।

ढ़ूढ़ रहा हूँ कुछ काम मिले ।
दो पैसे से परिवार खिले ।।
पढ़ा-लिखा मैं तनिक अनाड़ी ।
घर में ना कुछ खेती-बाड़ी ।।

दुष्‍कर लागे जीवन मेरा ।
निर्धनता ने डाला डेरा ।।
दो पैसे अब मैं कैसे पाऊँ ।
पढ़ा-लिखा खुद को बतलाऊँ ।।

-रमेश चौहान


अतुकांत कविता -मेरे अंतस में

आज अचानक 
मैंने अपने अंत: पटल में झांक बैठा
देखकर चौक गया
काले-काले वह भी भयावह डरावने
दुर्गुण  फूफकार रहे थे
मैं खुद को एक सामाजिक प्राणी समझता था
किंतु यहां मैंने पाया
समाज से मुझे कोई सरोकार ही नहीं
मैं परिवार का चाटुकार 
केवल बीवी बच्चे में भुले बैठा 
मां बाप को भी साथ नहीं दे पा
रहा
बीवी बच्चों से प्यार
नहीं नहीं यह तो केवल स्वार्थ दिख रहा है
मेरे अंतस में 
-रमेश चौहान

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