जनता मेरे देश का, दिखे विवश लाचार ।
अँकुश व्यपारी पर नहीं, सौ का लिए हजार ।।
सौ का लिए हजार, सभी लघु दीर्घ व्यपारी ।
लाभ नीति हो एक, देश में अब सरकारी ।।
कितना लागत मूल्य, बिक्री का कितना तेरे ।
ध्यान रखें सरकार, विवश हैं जनता मेरे ।।
Ramesh Kumar Chauhan
विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।
Manwata kaha hai ?
AAPNI AAKHO SE DEKHO
MAI DESH KA ..
जनता मेरे देश का, दिखे विवश लाचार ।
अँकुश व्यपारी पर नहीं, सौ का लिए हजार ।।
सौ का लिए हजार, सभी लघु दीर्घ व्यपारी ।
लाभ नीति हो एक, देश में अब सरकारी ।।
कितना लागत मूल्य, बिक्री का कितना तेरे ।
ध्यान रखें सरकार, विवश हैं जनता मेरे ।।
नित नव नूतन नवकिरण, दिनकर का उपहार ।
भीनी-भीनी भोर से, जाग उठा संसार ।।
जाग उठा संसार, खुशी नूतन मन भरने ।
नयन नयापन नाप, करे उद्यम दुख हरने ।।
सुन लो कहे ‘रमेश’, सोच रखिये चिर-नूतन ।
वही धरा नभ सूर्य, नहीं कुछ नित नव नूतन ।।
आयुष प्रभु धनवंतरी, हमें दीजिए स्वास्थ्य ।
आज जन्मदिन आपका, दिवस परम परमार्थ ।।
दिवस परम परमार्थ, पर्व यह धनतेरस का ।
असली धन स्वास्थ्य, दीजिए वर सेहत का ।।
धन से बड़ा "रमेश", स्वास्थ्य पावन पीयुष ।
आयुर्वेद का पर्व, आज बांटे हैं आयुष ।।
दीप (रूपमाला छंद)
दीप की शुभ ज्योति पावन, पाप तम को मेट ।
अंधियारा को हरे है, ज्यों करे आखेट ।
ज्ञान लौ से दीप्त होकर, ही करे आलोक ।
आत्म आत्मा प्राण प्राणी, एक सम भूलोक ।।
-रमेश चौहान
मेरे घर संस्कार का, टूट रहा दीवार ।
छद्म सोच के अस्त्र से, करे बच्चे प्रतिकार ।।
करे बच्चे प्रतिकार, कुपथ का बन सहचारी ।
मौज मस्ती के नाम, बने ना कुछ व्यवहारी।।
हृदय रक्त रंजीत, कुसंस्कारों के घेरे ।
बच्चे समझ न पाय, दर्द जो मन हैं मेरे ।।
-रमेश चौहान
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...