‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है

विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

रामेश्वर यात्रा

रामेश्वर यात्रा

 रामेश्वर यात्रा — तीर्थों की ओर

श्री शमी गणेश को प्रथम वंदन, 
जो हैं नवागढ़ के माथे का चंदन।

रामेश्वर यात्रा का श्रीगणेश,
 हमारे सहाय हों गौरी-महेश।

केशकाल की घाटी में, 
छत्तीसगढ़ की माटी में,
माता बंजारी से प्रथम भेंट कर, 
हँसी-खुशी आँचल में भर,

चले-चले हम अपने सफर, 
बाबा रामेश्वर की डगर।

1. भद्राचलम — गोदावरी के तट

पहला पड़ाव श्रीराम भद्राचलम धाम, 
गोदावरी के तट पर राम का नाम।

भद्र मेरु-मेनका के जाये, 
रामभक्ति में ध्यान लगाए।
भद्रगिरि की पावन धरती,
रामकथा की गाथा कहती।
भक्त रामदास की कर्मभूमि जहाँ, 
हम माथा अवनत किए वहाँ।

जिन्होंने राम  मंदिर हेतु,  कारावास के दुख सहे ।
भक्ति के स्वर में जिन्होंने, रामनाम की महिमा कहे।
गोदावरी की निर्मल धारा, मन को लगे राम का द्वारा।

2. विजयवाड़ा — माँ कनक दुर्गा

कनक दुर्गा को फिर किए नमन,
 कृष्णा तट पर विजयवाड़ा चमन।
इंद्रकीलाद्रि की ऊँची पहाड़ी,
 माँ की महिमा सबसे न्यारी।

जहाँ अर्जुन ने तप किया था,
 शिव का ध्यान जप किया था।
पाशुपतास्त्र का वर पाया, 
शौर्य-धैर्य का पाठ पढ़ाया।

कृष्णा की लहरें गीत सुनाएँ, 
माँ के चरणों में हम शीश झुकाएँ।
नवरात्रि में रूप निराले,
 दर्शन को आते भक्त मतवाले।

3. श्रीशैलम — मल्लिकार्जुन धाम

फिर श्रीशैलम की ओर चले, 
भक्ति-भाव के दीप जले।
नल्लमाला के वन-उपवन, 
प्रकृति करे शिव का अभिनंदन।
पातालगंगा कृष्णा की धारा,
 पर्वत ने पहना हरित किनारा।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग महान,
 शिव-शक्ति का पावन धाम।
भ्रमराम्बा माँ का आशीष, 
हर ले मन की पीर और खीझ।
शिव के दर्शन, मन में शांति,
 मिटती जाती जग की भ्रांति।

4. तिरुपति — श्रीवेंकटेश्वर बालाजी

अब तिरुमला की ओर बढ़े, 
श्रद्धा के पथ पर कदम चढ़े।
सात पहाड़ियों का दिव्य धाम, 
वेंकटेश्वर प्रभु का नाम।
गोविंदा-गोविंदा की  गूँजे वाणी, 
भक्तों की आँखों में भक्ति  की पानी।
श्रीनिवास की महिमा न्यारी,
 दर्शन को दुनिया बलिहारी।
लंबी कतार, प्रतीक्षा भारी, 
फिर भी श्रद्धा सबसे प्यारी।
लड्डू का प्रसाद हाथ में आया, 
मन ने प्रभु का धन्यवाद गाया।

5. श्रीरंगम — रंगनाथ स्वामी

कावेरी की गोद सुहानी, 
श्रीरंगम की कथा पुरानी।
रंगनाथ स्वामी शेषशायी,
 विष्णु की छवि मन को भाई।
विशाल प्राकार, गोपुरम ऊँचे, 
भक्त खड़े हाथ जोड़े नीचे।
भक्ति, कला और इतिहास का संगम, 
हर दिशा में प्रभु का वंदन।
कावेरी की लहरें कहतीं, 
हरि की महिमा जग में रहती

6. कांचीपुरम — एकाम्बरेश्वर धाम

कांचीपुरम की पावन धरती, 
मंदिरों की महिमा कहती।
एकाम्बरेश्वर शिव के द्वारे, 
भक्त खड़े श्रद्धा के धारे।
पृथ्वी तत्त्व का शिवलिंग महान, 
पार्वती तप की अमर पहचान।
आम्रवृक्ष की कथा सुहानी, 
शिव-पार्वती का प्रेम बखानी।
पत्थर-पत्थर इतिहास सुनाए, 
शिल्प प्राचीन गौरव गाए।

7. मदुरै — माँ मीनाक्षी का नगर

मदुरै नगरी पहुँचे हम, 
मीनाक्षी माँ को किये नमन।
मीन-नयन वाली माँ भवानी, 
 पांड्य की सुंदर राजधानी।
मीनाक्षी-सुंदरेश्वर पर अभिमान, 
मंदिर में गूँजे मंगल-गान।
ऊँचे गोपुरम रंग हजार, 
शिल्पकला का अनुपम संसार।
वैगई नदी की पावन धारा,
 इतिहास का उज्ज्वल सितारा।
माँ के चरणों में अरदास,
 बनी रहे जीवन में मिठास।

8. रामेश्वरम् — यात्रा का परम धाम

अब रामेश्वरम् की बारी आई,
 मन में नई उमंग समाई।
पंबन पुल का दृश्य निराला, 
सागर ने नीला आँचल डाला।
लहरों के ऊपर रेल की राह, 
प्रकृति ने खोली सुंदर बाँह।

रामनाथस्वामी का धाम, 
शिवलिंग में राम का नाम।
कहते हैं रावण-वध के बाद, 
राम ने शिव से की फरियाद।
सीता जी ने बालुकामय शिवलिंग बनाया, 
राम ने श्रद्धा से शीश झुकाया।
हनुमान लाए काशी से लिंग,
 दोनों की महिमा अनंत-अनंग।

रामलिंग और विश्वलिंग का मान,
 शिव-भक्ति का अनुपम गान।
अग्नि तीर्थ में शीश नवाया, 
सागर को श्रद्धा-जल चढ़ाया।
बाईस तीर्थों का जल स्नान, 
पावन हुआ तन और प्राण।

लंबे गलियारे, स्तंभ हजार, 
द्रविड़ कला का अद्भुत विस्तार।
स्फटिक लिंग के दर्शन पाए, 
हर-हर महादेव मन गाए।
सीता-राम और शिव का मेल, 
भक्ति का अनुपम पावन खेल।
गंगोत्री का जल हम जो लेकर आयें
बाबा की श्री चरण हम चढ़ाये
रामेश्वर की रज माथे लगाई, 
जीवन की यात्रा धन्य बनाई।

9. कन्याकुमारी — तीन सागरों का संगम

चले अब हम दक्षिण की ओर, जहां तीन सागरों के मिले छोर ।
अरब, हिंद, बंगाल की खाड़ी ,
ज्यों धरती की अविरल  नाड़ी 
तीनों जल का अनुपम मेल, 
प्रकृति रचे यह अनोखा खेल।

कुमारी अम्मन का पावन धाम,
 देवी तप की अमर नाम
सूर्योदय का दृश्य निराला, 
सूर्यास्त ने रंग सजाया।
विवेकानंद शिला पर ध्यान, 
जागे आत्मबोध का ज्ञान।
लहरों ने संगीत सुनाई,
 मन में नई चेतना आई।
क्षितिज जहाँ सागर से मिलता, 
मन का हर संकल्प निखरता।

10. केरल — पद्मनाभस्वामी

फिर केरल की ओर बढ़े, 
हरित धरा के रंग चढ़े।
नारियल, सागर, हरियाली, 
प्रकृति लगे अनुपम मतवाली।
पद्मनाभ स्वामी का धाम, 
अनंतशायी विष्णु का नाम।
शेषनाग पर प्रभु विराजें, 
तीन द्वारों से दर्शन साजें।
अनंत पद्मनाभ की छाया, 
मन ने भक्ति-रस भर पाया।
द्रविड़ कला का अद्भुत रूप,
 मंदिर का वैभव अनूप।

11. श्रीकालहस्ती — वायु लिंग की महिमा

श्रीकालहस्ती धाम में आए, 
शिव के चरणों में शीश झुकाए।
वायु तत्त्व का लिंग निराला, 
भक्ति का उजियारा मतवाला।
कण्णप्पा की भक्ति महान, 
शिव ने दिया उन्हें सम्मान।
मकड़ी, सर्प और हाथी की कथा, 
शिवभक्ति की अमर व्यथा।
दीप जले और घंटी बाजे, 
शिव के नाम से मन अनुरागे।

12.वापसी में माँ दंतेश्वरी

लौट चले अपनी माटी की ओर, 
मन में श्रद्धा, आँखों में भोर।
दंतेवाड़ा की पावन धरती, 
माँ दंतेश्वरी की महिमा कहती।
बस्तर अंचल की अधिष्ठात्री, 
भक्तों की माँ, जगत की धात्री।
शक्ति-पीठ की महिमा न्यारी, 
आस्था की ज्योति सबसे प्यारी।
वन-पर्वत की गोद सुहानी, 
बस्तर की संस्कृति अनुपम कहानी।
माँ के दर पर शीश नवाया, 
यात्रा का पुण्य प्रसाद पाया।

समापन — तीर्थों की सीख

नवागढ़ से यात्रा में  ज्यों चले
मन में भक्ति की ज्योति प्ले ।

नदियाँ, पर्वत, मंदिर, धाम, 
हर पथ पर गूँजा प्रभु का नाम।

कहीं राम तो कहीं महादेव, 
कहीं भवानी, कहीं जनार्दन देव।

कहीं तपस्या, कहीं बलिदान, 
कहीं भक्ति का अमर गान।

इतिहास मिला, पुराण मिले, 
प्रकृति के सुंदर विधान मिले।

भारत की धरती, भारत की शान, 
तीर्थों में बसता इसका प्राण।

हमने केवल दर्शन नहीं किए, 
अनुभव के मोती मन में लिए।
संग-संग भोजन जो हम करते 
भजन गीत का आनंद उर भरते
सुख-दुख, सेवा, प्रेम और त्याग, 
जीवन को देते नया सुहाग।

हे गौरीशंकर, रखना ध्यान, 
सदा बना रहे श्रद्धा का मान।

श्री शमी गणेश की कृपा बनी रहे, 
नवागढ़ की माटी महकती रहे।

रामेश्वर की यात्रा का यही संदेश, 
प्रेम, सद्भाव और सेवा विशेष।

जय श्रीराम! हर-हर महादेव! 
जय माँ दुर्गा! जय जनार्दन देव!

- रमेश चौहान 
8839024871

करुणा करो हे खाटू श्याम

मुखड़ा 
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
मैं उथली नदिया, जलाजल गंभीर सागर हो तुम

अंतरा 1
जब-जब राहों में अंधियारा छाया,
जीवन नैय्या जब भंवर में समाया
केवल तन ही नहीं जब मन भी हारा
तब साथ आते हारे का सहारा 
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम

अंतरा 2
ना पुण्य गिना, ना पाप ही तोला,
प्रेम पीर से,  जब अंतस बोला,
शरण आये नर जब कोई ऐसा,
फलित हो कामना मन में हो जैसा
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम

अंतरा 3
मेरे  तन के रोम-रोम पुकारे,
श्याम ही है हमारे सहारे
पार लगाओ अब नैय्या मोरी
तुम्हारी दया है अति पावन भोरी
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम

अंतरा 4 
दास रमेश बस यही कहे,
चरणों में जीवन मेरा रहे,
नहीं दुनिया में कोई मेरे सगे
श्याम बिना सब व्यर्थ ही लगे
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम

करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
हारे का सहारा श्याम, भवकूप का उजागर हो तुम
करुणा करो हे खाटू श्याम, दया के सागर हो तुम
मैं उथली नदिया, जलाजल गंभीर सागर हो तुम

गीत : आज बंधे दो मन एक डोर में

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 1 (स्त्री स्वर)
अजनबी थे हम कल तक
आज साथी इस जीवन
माथे की इस सिंदूरी रेखा में
मेरे सपने होकर सजते हो

नयनों में रूप तुम्हारा
होंठों पे तू ही मुस्कान
मन ही मन स्वीकार किया
तुम्हें मैंने अपना प्राण 

अंतरा 2 (पुरुष स्वर)
पहली बार जब देखा तुम्हें
मन ठहर-सा गया
तेरी पायल की धुन से
तन मन हर्षित हो गया

कंगन की खनक सुन मन कहता है
हर सुख-दुख मैं हर पल साथ रहूँ
तेरी हँसी, तेरी आँखों में ही
अपना पूरा संसार कहूँ

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 3 (युगल धीमी लय)
तुम मेरे मन का श्रृंगार बनो
मैं तुम्हारी धीरज बन जाऊँ
तन से पहले मन मिल जाए
ऐसा प्रेम विधान निभाऊँ

मर्यादा मेरी भूषण हो
श्रद्धा मेरी पहचान
संग-संग चलकर रच देंगे
स्नेह, समर्पण, सम्मान

अंतरा 4 (स्त्री)
मेरी चूड़ी, मेरी बिंदी
तुम्हारे नाम सजी
तुम्हारी एक दृष्टि में ही
मेरी दुनिया बस गई

अंतरा 5 (पुरुष)
तेरी लाज मेरी मर्यादा
तेरी खुशी मेरा मान
जीवन भर का वचन यही
तू मेरा अभिमान

अंतिम मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में


मेरे गांव में

बेजाकब्जा का दौर
बेजाकब्जा का दौर
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
अंतरा 1
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
बेजाकब्जा का दौर,
किसी को किसी का कहां डर 
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 2
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
बच्चे खेल खेलें कहां अब
गली आँगन उजड़ गया
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 3
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
बेजाकब्जा का दौर,
गोचर ही हो गया खेत
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 4
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
बेजाकब्जा का दौर,
नदियों का कल-कल मौन
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 5
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बेजाकब्जा का दौर,
खो गई जीवन की मस्ती
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 6
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली 
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली
बेजाकब्जा का दौर,
बचे न कहीं भूमि खाली
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

मुखड़ा (दोहराव)
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे  बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

मेरे मोहल्ले की वह गली,
जिसकी चौड़ी थी छाती ।
जहां खड़ी होती थी 
एक साथ चार-चार बैलगाड़ी
सकरी संकल सा राह पर
ढूंढ नहीं पा रहा उसे मैं अनाड़ी 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

जहां हम सब खेला करते
दांव पेच हुंकार भरते 
मेरी गौ का गोचर भूमि 
और गौठान मेरे गांव   
ढूंढ रहा मैं डगर-डगर
लेकर अपनी यादों की छांव ।

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

नदी का वह  कल-कल पानी 
तालाब का लहरता रवानी 
मेरी मां का वह पनघट
और घाट-बाट का खटपट 
ढूंढ रहा मैं होकर आकुल
आहें लंबी और मन व्याकुल 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

लालच लोभ लोगों पर
पांव से सिर तक चढ़ा 
इंच-इंच जमीन डकार कर
दोष सरकार पर मढ़ा 
बड़ा है हर भ्रष्टाचार से 
मन क्षुब्ध हैं ऐसे व्यवहार से

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 


अटल बिहारी वाजपेई

अटल अटल है आपका, ध्रुव तरा सा नाम ।
बोल रहा हर गांव में,  पहुंच सड़क का काम ।।

जोड़ दिए हर गांव को, मुख्य सड़क के साथ।
गांव शहर से  जब जुड़ा, कारज आया हाथ ।

बदल दिया जीवन जगत,  देकर हमें विचार ।
आम लोग भी खाश हैं,  दिए अटल आचार ।।

लोकतंत्र का ध्येय जब, था धूसर तम श्याम।
अंत्योदय का नाद कर, अटल किए निजी काम ।।

स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, गढ़ा देश का साख।
दम्भ पोखरण का अटल,  केवल था नहिं राख ।।



शिक्षा: एक अच्छा नौकर है, मालिक नहीं

 



हमने विज्ञान का निबंध

रटा था,

विज्ञान एक अच्छा नौकर है,

मालिक नहीं


आज एक समाचार पढ़ा

एक मेजर के तीन लड़के थे

खूब-पढ़ाया लिखाया

ऐशों आराम दौलत थमाया


समय चक्र चलता गया,

मेजर की पत्नी चल बसी

बेटे पत्नियों से युक्त

मेजर बूढ़ा हो चला


हाथ-पैर असक्‍त

जुबान बंद

वह बिस्तर का 

कैदी रह गया 


धन का कमी था नहीं

बेटे बाप को 

नौकर भरोसे छोड़

विदेश चले गए

मेजर के बेटे होने का

रौब दिखाते हुए


नौकर भला इंसान

सेवा करता नित

बिस्तर के कैदी का


एक दिन नौकर

गया बाजार

खरीदने मेजर के लिए

जरुरी सामान


पर नियति ने

उसे ठोकर मारी

दुर्घटना में वह

दुनिया को कह गया

अलविदा


मेजर बिस्तर का कैदी

बंद कमरे में

बंद हो गया

बंद हो गई

उसकी जीवन लीला


महीनों बाद

बेटे लौटे

विदेश के सैर से

कंकाल पड़ा मिला

बाप का नहीं

मेजर का

मेजर के बेटों को


न जाने

ऐसे कितने

माँ-बाप

मरते रहे हैं

मरते रहेंगे


संतानों को

पढ़ा-लिखा कर,

साहब बना कर

अपने सुख चैन

अपनी जिंदगी

गंवाकर


यह शिक्षा

कान्वेंट का

साहब बनाने,

बच्चों को 

धनवान बनाने

भौतिकता के पीछे

नैतिकता खोकर

भाग जाने का

एक अच्‍छा मालिक

हो नहीं सकता

विज्ञान की तरह


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