ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
मेरे मोहल्ले की वह गली,
जिसकी चौड़ी थी छाती ।
जहां खड़ी होती थी
एक साथ चार-चार बैलगाड़ी
सकरी संकल सा राह पर
ढूंढ नहीं पा रहा उसे मैं अनाड़ी
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
जहां हम सब खेला करते
दांव पेच हुंकार भरते
मेरी गौ का गोचर भूमि
और गौठान मेरे गांव
ढूंढ रहा मैं डगर-डगर
लेकर अपनी यादों की छांव ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
नदी का वह कल-कल पानी
तालाब का लहरता रवानी
मेरी मां का वह पनघट
और घाट-बाट का खटपट
ढूंढ रहा मैं होकर आकुल
आहें लंबी और मन व्याकुल
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
लालच लोभ लोगों पर
पांव से सिर तक चढ़ा
इंच-इंच जमीन डकार कर
दोष सरकार पर मढ़ा
बड़ा है हर भ्रष्टाचार से
मन क्षुब्ध हैं ऐसे व्यवहार से
ढूंढ़ो ढूंढ़ो
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो





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