जो पाले अलगाववाद को, उसको हमने ही पाला ।
झांके ना घर के भेदी को, जपे दूसरों की माला ।।
पाल हुर्रियत मुसटंडों को, क्यों अश्रु बहाते हो ।
दोष दूसरों को दे देकर, हमकों ही बहकाते हो ।।
राजनीति के ढाल ओढ़ कर, बुद्धिमान कहलाते हो।
इक थैली के चट्टे-बट्टे, जो सरकार बनाते हो ।।
आतंकी के जो सर्जक पालक, उनको ही पहले मारो ।
निश्चित ही आतंक खत्म हो, अपनों...
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आस्तिन के सांपो को अब कुचलना होगा
औकात नहीं है गैरों का, जो हमकों आँख दिखाये ।
ये तो घर के ही भेदी हैं, जो बैरी बनकर आये ।।
भारत माता की जय कहना, जिसको है नही गवारा ।
आज निभायें कैसे उनसे, एकाकी भाईचारा ।।
भारतीय सेना पर बैरी, जब-तब पत्थर है मारे ।
सहन शक्ति की सीमा होती, इन्हें कहे कैसे प्यारे ।।
जिन्हे तिरंगे पर मान नही, वह कैसे हिन्दुस्तानी ।
जो भारत को खण्डित करने,...
मेरी बाहो में आओ
नीले नभ से उदित हुई तुम, नूतन किरणों सी छाई।ओठो पर मुस्कान समेटे,सुधा कलश तुम छलकाई ।।
निर्मल निश्चल निर्विकार तुम, परम शांति को बगराओ ।बाहों में तुम खुशियां भरकर, मेरी बाहो में आओ।।
-रमेश चौहान...
मेरी बाहो में आओ
नीले नभ से उदित हुई तुम,
नूतन किरणों सी छाई।
ओठो पर मुस्कान समेटे,
सुधा कलश तुम छलकाई ।।
निर्मल निश्चल निर्विकार तुम,
परम शांति को बगराओ ।
बाहों में तुम खुशियां भरकर,
मेरी बाहो में आओ।।
-रमेश चौहान...
कुलषित संस्कृति हावी तुम पर
कुलषित संस्कृति हावी तुम पर, बांह पकड़ नाच नचाये ।
लोक-लाज शरम-हया तुमसे, बरबस ही नयन चुराये ।।
किये पराये अपनो को तुम, गैरों से हाथ मिलाये ।
भौतिकता के फेर फसे तुम, अपने घर आग लगाये ।।
मैकाले के जाल फसे हो, समझ नही तुझको आयेे ।
अपनी संस्कृति अपनी माटी, तुझे फुटी आँख न भाये ।।
दुग्ध पान को श्रेष्ठ जान कर, मदिरा को क्यो अपनाये ।
पियुष बूॅद गहे नही...
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