‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है

विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

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रामेश्वर यात्रा

रामेश्वर यात्रा

 रामेश्वर यात्रा — तीर्थों की ओर

श्री शमी गणेश को प्रथम वंदन, 
जो हैं नवागढ़ के माथे का चंदन।

रामेश्वर यात्रा का श्रीगणेश,
 हमारे सहाय हों गौरी-महेश।

केशकाल की घाटी में, 
छत्तीसगढ़ की माटी में,
माता बंजारी से प्रथम भेंट कर, 
हँसी-खुशी आँचल में भर,

चले-चले हम अपने सफर, 
बाबा रामेश्वर की डगर।

1. भद्राचलम — गोदावरी के तट

पहला पड़ाव श्रीराम भद्राचलम धाम, 
गोदावरी के तट पर राम का नाम।

भद्र मेरु-मेनका के जाये, 
रामभक्ति में ध्यान लगाए।
भद्रगिरि की पावन धरती,
रामकथा की गाथा कहती।
भक्त रामदास की कर्मभूमि जहाँ, 
हम माथा अवनत किए वहाँ।

जिन्होंने राम  मंदिर हेतु,  कारावास के दुख सहे ।
भक्ति के स्वर में जिन्होंने, रामनाम की महिमा कहे।
गोदावरी की निर्मल धारा, मन को लगे राम का द्वारा।

2. विजयवाड़ा — माँ कनक दुर्गा

कनक दुर्गा को फिर किए नमन,
 कृष्णा तट पर विजयवाड़ा चमन।
इंद्रकीलाद्रि की ऊँची पहाड़ी,
 माँ की महिमा सबसे न्यारी।

जहाँ अर्जुन ने तप किया था,
 शिव का ध्यान जप किया था।
पाशुपतास्त्र का वर पाया, 
शौर्य-धैर्य का पाठ पढ़ाया।

कृष्णा की लहरें गीत सुनाएँ, 
माँ के चरणों में हम शीश झुकाएँ।
नवरात्रि में रूप निराले,
 दर्शन को आते भक्त मतवाले।

3. श्रीशैलम — मल्लिकार्जुन धाम

फिर श्रीशैलम की ओर चले, 
भक्ति-भाव के दीप जले।
नल्लमाला के वन-उपवन, 
प्रकृति करे शिव का अभिनंदन।
पातालगंगा कृष्णा की धारा,
 पर्वत ने पहना हरित किनारा।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग महान,
 शिव-शक्ति का पावन धाम।
भ्रमराम्बा माँ का आशीष, 
हर ले मन की पीर और खीझ।
शिव के दर्शन, मन में शांति,
 मिटती जाती जग की भ्रांति।

4. तिरुपति — श्रीवेंकटेश्वर बालाजी

अब तिरुमला की ओर बढ़े, 
श्रद्धा के पथ पर कदम चढ़े।
सात पहाड़ियों का दिव्य धाम, 
वेंकटेश्वर प्रभु का नाम।
गोविंदा-गोविंदा की  गूँजे वाणी, 
भक्तों की आँखों में भक्ति  की पानी।
श्रीनिवास की महिमा न्यारी,
 दर्शन को दुनिया बलिहारी।
लंबी कतार, प्रतीक्षा भारी, 
फिर भी श्रद्धा सबसे प्यारी।
लड्डू का प्रसाद हाथ में आया, 
मन ने प्रभु का धन्यवाद गाया।

5. श्रीरंगम — रंगनाथ स्वामी

कावेरी की गोद सुहानी, 
श्रीरंगम की कथा पुरानी।
रंगनाथ स्वामी शेषशायी,
 विष्णु की छवि मन को भाई।
विशाल प्राकार, गोपुरम ऊँचे, 
भक्त खड़े हाथ जोड़े नीचे।
भक्ति, कला और इतिहास का संगम, 
हर दिशा में प्रभु का वंदन।
कावेरी की लहरें कहतीं, 
हरि की महिमा जग में रहती

6. कांचीपुरम — एकाम्बरेश्वर धाम

कांचीपुरम की पावन धरती, 
मंदिरों की महिमा कहती।
एकाम्बरेश्वर शिव के द्वारे, 
भक्त खड़े श्रद्धा के धारे।
पृथ्वी तत्त्व का शिवलिंग महान, 
पार्वती तप की अमर पहचान।
आम्रवृक्ष की कथा सुहानी, 
शिव-पार्वती का प्रेम बखानी।
पत्थर-पत्थर इतिहास सुनाए, 
शिल्प प्राचीन गौरव गाए।

7. मदुरै — माँ मीनाक्षी का नगर

मदुरै नगरी पहुँचे हम, 
मीनाक्षी माँ को किये नमन।
मीन-नयन वाली माँ भवानी, 
 पांड्य की सुंदर राजधानी।
मीनाक्षी-सुंदरेश्वर पर अभिमान, 
मंदिर में गूँजे मंगल-गान।
ऊँचे गोपुरम रंग हजार, 
शिल्पकला का अनुपम संसार।
वैगई नदी की पावन धारा,
 इतिहास का उज्ज्वल सितारा।
माँ के चरणों में अरदास,
 बनी रहे जीवन में मिठास।

8. रामेश्वरम् — यात्रा का परम धाम

अब रामेश्वरम् की बारी आई,
 मन में नई उमंग समाई।
पंबन पुल का दृश्य निराला, 
सागर ने नीला आँचल डाला।
लहरों के ऊपर रेल की राह, 
प्रकृति ने खोली सुंदर बाँह।

रामनाथस्वामी का धाम, 
शिवलिंग में राम का नाम।
कहते हैं रावण-वध के बाद, 
राम ने शिव से की फरियाद।
सीता जी ने बालुकामय शिवलिंग बनाया, 
राम ने श्रद्धा से शीश झुकाया।
हनुमान लाए काशी से लिंग,
 दोनों की महिमा अनंत-अनंग।

रामलिंग और विश्वलिंग का मान,
 शिव-भक्ति का अनुपम गान।
अग्नि तीर्थ में शीश नवाया, 
सागर को श्रद्धा-जल चढ़ाया।
बाईस तीर्थों का जल स्नान, 
पावन हुआ तन और प्राण।

लंबे गलियारे, स्तंभ हजार, 
द्रविड़ कला का अद्भुत विस्तार।
स्फटिक लिंग के दर्शन पाए, 
हर-हर महादेव मन गाए।
सीता-राम और शिव का मेल, 
भक्ति का अनुपम पावन खेल।
गंगोत्री का जल हम जो लेकर आयें
बाबा की श्री चरण हम चढ़ाये
रामेश्वर की रज माथे लगाई, 
जीवन की यात्रा धन्य बनाई।

9. कन्याकुमारी — तीन सागरों का संगम

चले अब हम दक्षिण की ओर, जहां तीन सागरों के मिले छोर ।
अरब, हिंद, बंगाल की खाड़ी ,
ज्यों धरती की अविरल  नाड़ी 
तीनों जल का अनुपम मेल, 
प्रकृति रचे यह अनोखा खेल।

कुमारी अम्मन का पावन धाम,
 देवी तप की अमर नाम
सूर्योदय का दृश्य निराला, 
सूर्यास्त ने रंग सजाया।
विवेकानंद शिला पर ध्यान, 
जागे आत्मबोध का ज्ञान।
लहरों ने संगीत सुनाई,
 मन में नई चेतना आई।
क्षितिज जहाँ सागर से मिलता, 
मन का हर संकल्प निखरता।

10. केरल — पद्मनाभस्वामी

फिर केरल की ओर बढ़े, 
हरित धरा के रंग चढ़े।
नारियल, सागर, हरियाली, 
प्रकृति लगे अनुपम मतवाली।
पद्मनाभ स्वामी का धाम, 
अनंतशायी विष्णु का नाम।
शेषनाग पर प्रभु विराजें, 
तीन द्वारों से दर्शन साजें।
अनंत पद्मनाभ की छाया, 
मन ने भक्ति-रस भर पाया।
द्रविड़ कला का अद्भुत रूप,
 मंदिर का वैभव अनूप।

11. श्रीकालहस्ती — वायु लिंग की महिमा

श्रीकालहस्ती धाम में आए, 
शिव के चरणों में शीश झुकाए।
वायु तत्त्व का लिंग निराला, 
भक्ति का उजियारा मतवाला।
कण्णप्पा की भक्ति महान, 
शिव ने दिया उन्हें सम्मान।
मकड़ी, सर्प और हाथी की कथा, 
शिवभक्ति की अमर व्यथा।
दीप जले और घंटी बाजे, 
शिव के नाम से मन अनुरागे।

12.वापसी में माँ दंतेश्वरी

लौट चले अपनी माटी की ओर, 
मन में श्रद्धा, आँखों में भोर।
दंतेवाड़ा की पावन धरती, 
माँ दंतेश्वरी की महिमा कहती।
बस्तर अंचल की अधिष्ठात्री, 
भक्तों की माँ, जगत की धात्री।
शक्ति-पीठ की महिमा न्यारी, 
आस्था की ज्योति सबसे प्यारी।
वन-पर्वत की गोद सुहानी, 
बस्तर की संस्कृति अनुपम कहानी।
माँ के दर पर शीश नवाया, 
यात्रा का पुण्य प्रसाद पाया।

समापन — तीर्थों की सीख

नवागढ़ से यात्रा में  ज्यों चले
मन में भक्ति की ज्योति प्ले ।

नदियाँ, पर्वत, मंदिर, धाम, 
हर पथ पर गूँजा प्रभु का नाम।

कहीं राम तो कहीं महादेव, 
कहीं भवानी, कहीं जनार्दन देव।

कहीं तपस्या, कहीं बलिदान, 
कहीं भक्ति का अमर गान।

इतिहास मिला, पुराण मिले, 
प्रकृति के सुंदर विधान मिले।

भारत की धरती, भारत की शान, 
तीर्थों में बसता इसका प्राण।

हमने केवल दर्शन नहीं किए, 
अनुभव के मोती मन में लिए।
संग-संग भोजन जो हम करते 
भजन गीत का आनंद उर भरते
सुख-दुख, सेवा, प्रेम और त्याग, 
जीवन को देते नया सुहाग।

हे गौरीशंकर, रखना ध्यान, 
सदा बना रहे श्रद्धा का मान।

श्री शमी गणेश की कृपा बनी रहे, 
नवागढ़ की माटी महकती रहे।

रामेश्वर की यात्रा का यही संदेश, 
प्रेम, सद्भाव और सेवा विशेष।

जय श्रीराम! हर-हर महादेव! 
जय माँ दुर्गा! जय जनार्दन देव!

- रमेश चौहान 
8839024871

ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे  बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

मेरे मोहल्ले की वह गली,
जिसकी चौड़ी थी छाती ।
जहां खड़ी होती थी 
एक साथ चार-चार बैलगाड़ी
सकरी संकल सा राह पर
ढूंढ नहीं पा रहा उसे मैं अनाड़ी 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

जहां हम सब खेला करते
दांव पेच हुंकार भरते 
मेरी गौ का गोचर भूमि 
और गौठान मेरे गांव   
ढूंढ रहा मैं डगर-डगर
लेकर अपनी यादों की छांव ।

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

नदी का वह  कल-कल पानी 
तालाब का लहरता रवानी 
मेरी मां का वह पनघट
और घाट-बाट का खटपट 
ढूंढ रहा मैं होकर आकुल
आहें लंबी और मन व्याकुल 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

लालच लोभ लोगों पर
पांव से सिर तक चढ़ा 
इंच-इंच जमीन डकार कर
दोष सरकार पर मढ़ा 
बड़ा है हर भ्रष्टाचार से 
मन क्षुब्ध हैं ऐसे व्यवहार से

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 


प्रेम और संबंध में पहले आया कौन

/तुकबंदी/

एक प्रश्न आपसे पूछें 
प्रेम और संबंध में पहले आया कौन ।
जिसने भी सुना यह प्रश्न साध रखा मौन ।।

कहने लगे मुर्गी पहले आया कि अंडा ।
कुछ इसी प्रकार का है यह तुम्हारा फंडा ।।

नहीं नहीं आसान है ।
कहां तुम्हारा ध्यान है ।।
आओ इस प्रश्न से जूझें

एक प्रश्न आपसे पूछें 
प्रेम और संबंध में पहले आया कौन ।
जिसने भी सुना यह प्रश्न साध रखा मौन ।।

अच्छा चलो एक दूसरा प्रश्न पूछते हैं ।
आओ मिलकर इसी पर  जुझते हैं ।।

तुम्हारी मां ने तुझे बेटा मानकर पहले प्यार किया ।
या कि तुझे प्यार करने के बाद बेटा मान लिया ।।

पहले माना ।
या पहले जाना ।।
चलो इसी पर आप जूझें 

एक प्रश्न आपसे पूछें 
प्रेम और संबंध में पहले आया कौन ।
जिसने भी सुना यह प्रश्न साध रखा मौन ।।

चाहे संतान दुर्गुणी कुरूप हो ।
चाहे उसका सद्गुणी स्वरूप हो ।।

फिर भी मां उससे प्रेम करती है ।
अपने से ज्यादा उस पर मरती है ।।

अब तो इस पहेली को बुझें।
मन बुद्धि विवेक से जूझें ।।
एक प्रश्न आपसे पूछें 
प्रेम और संबंध में पहले आया कौन ।
जिसने भी सुना यह प्रश्न साध रखा मौन ।।


-रमेश चौहान

वो प्यार नहीं तो क्या था?

तेरे नैनों का निमंत्रण पाकर
मेरी धड़कन तुम्हारी हुई ।

मेरे नैना तुम्हारी अंखियों से,
पूछा जब एक सवाल
तुम में ये मेरा बिम्ब कैसा ?
पलकों के ओट पर छुपकर
वह बोल उठी- "मैं तुम्हारी दुलारी हुई ।"

नैनों की भाषा जुबा क्या समझे
कहता है ना तुझसे मेरा वास्ता
यह तकरार नहीं तो क्या था ?
नयनों ने फिर नैनों से पूछा
वो प्यार नहीं तो क्या था ??

-रमेश चौहान

हर संकटों से जुझने का संकल्प दें ।

हे विधाता नही बदनला मुझे तेरा विधान,
हर दुःख- सुख में मेरा कर दे कल्याण ।
चाहे जितना कष्ट मेरे भाग्य में भर दे,
पर हर संकटों से जुझने का संकल्प दें ।

जो संकट आये जीवन में उनसे मैं दो दो हाथ करू,
संकट हो चाहे जितना विकट उनसे मै कभी न डरू ।
चाहे मेरे हर पथ पर कंटक बिखेर दें,
पर उन कंटकों में चलने का साहस भर दें ।

कष्टो से विचलित हो अपनी मानवता धर्म कभी न भूलू,
हर जीवो के पथ के कंटक अपनी झोली में भर लू ।
चाहे मेरे जीवन को अश्रु धारा से भर दें,
पर अश्रु सागर को पीने मुझे अगस्त-सा कर दें ।

जीवन के किसी खुशी से मैं बौराऊ न,
अपनी खुशी में किसी को सताऊ न ।
चाहे जितनी खुशियां मेरी झोली में भर दे,
पर हर खुशीयों में जीने मुझे जनक-सा कर दें ।।

..............रमेश.........................

यही सत्य ही सत्य है

मानों या न मानो यारों
यही सत्य ही सत्य है

केवल प्यार ही प्यार है
प्यार देखता नही कभी मजहब
न लड़का न लड़की
समझे इसका मतलब

प्यार लिंग भेद में है नही
यह तो वासना है यारों

कभी किसी ने सोचा है
केवल युवक और युवती
क्यों करते फिरते रहते
प्यार, प्यार इस जगती

प्यार कैद में होता नही
यह तो स्वार्थ है यारों

प्यार के दुहाई देने वाले
जग के प्यार भूल बैठे हैं
जनक जननी को छोड़ खड़े
अपने मैं ऐठे ऐठे है

प्यार हत्यारा होता नहीं
यह तो पागलपन है यारों

मानों या न मानों यारों
यही सत्य ही सत्य है

-रमेश चौहान

नारी नर एक समान

नारी तेरे कितनेे रूप, सभी रूप में तू अद्भूत ।
मां बहना पुत्री हुई, हुई पत्नि अवधूूत ।।
पिता बन कर लालन किये, पति बन कर पालन किये ।
हे पुरूष तुम संतान दे, नारी को नारी कियेे ।।
सृष्टि मेंं नर नारी का,सत्ता सदा समान है।
नर से नारी का और नारी से नर का सम्मान है ।।
पूूरक एक दूूसरेे के, बंधे एक दूसरे से ।
अस्‍ितत्व नही है, किसी तीसरे से ।।
एक महिमा मंडित हो, दूजा गाली खाये ।
जग का ऐसा विधान, विधाता को भी ना भाये ।।
-रमेेश चौहान

हम आजाद है हम आजाद है

पक्षीय गगन चहके गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
नदीयां बहती करती कलकल
हम आजाद है हम आजाद है
तरू शाखा लहराये और गाये
हम आजाद है हम आजाद है
मृग उछलते नाचते गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
मयूर पसारे पंख नाचे गाये
हम आजाद है हम आजाद है
तन प्रफूल्लित मन प्रफूल्लित
हम आजाद है हम आजाद है
मन सोचे प्रकति अनुकूल
तन झूमे प्रकृति अनुकूल
प्रकृति अनुशासन में रहके बोले
हम आजाद है हम आजाद है ।।

अब जमाना लग रहे रूपहले

अब जमाना लग रहे रूपहले 
याद आ रहा है मुझे  एक बात,
मेरे दादाजी ने जो कहे एक रात ।
धरती पर स्वर्ग लगते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

भुले बिसरे से लगते अब हमारे संस्कार,
परम्पराओं पर भारी पड़ रहे अब नवाचार ।
परम्पराओं पर जान छिड़कते थे लोग पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

मेरे माता पिता ने सिखये जो रीति,
तेरे पापा उसे ही तो कह रहे कुरीति ।
हर रीति में नीति होते थे पहले
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

कहते अब ‘हम दो हमारे दो‘ प्यारे,
हमें क्या रहने दो और रिष्ते सारे ।
एक छप्पर तले जीते थे हम पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

अब मान कहां धरम ईमान का,
अब कीमत कहां जुबान का ।
अब कहां छोटे बड़े का मान है,
सभी के सम्मान होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।


मर्यादाओं का सीमा टूट रहे,
युवक युवती मजे लूट रहे ।
अब चेहरा श्वेत होवे न श्याम
मुंह काले हो जाते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

दाम्पत्य जीवन टूट रहे,
नर नारी में आक्रोश फूट रहे ।
पति पत्नि का सम्मान आ गया बाजार,
जो घर के अंदर कैद होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

परिवार के आधार टूट रहे,
परम्पराओं के दामन छूट रहे ।
संस्कार पथ छोड़े हो रहे ये हाल,
‘सादा जीवन उच्च विचार‘ से जीते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

गुरू

जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू,
अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू ।

कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू,
निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू ।

न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू,
चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू ।

सारे अपराधो से सना तन मन  है मेरा गुरू,
अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू ।

दयावंत आप हे कृपालु भी आप है गुरू,
दया की नजर से मुझे एक बार निहारो गुरू ।

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।

भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।

डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।

निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नई सबेरा है ।

राही कोई और हो न सही,
अपने आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है ।

एक गौरेया की पुकार

एक गौरैया एक मनुज से कहती है ये बोल,
हे बुद्विमान प्राणी हमारे जीवन का क्या है मोल ।

अपने हर प्रगति को अब तो जरा लो तोल,
सृष्टि के कण-कण में दिया है तूने विष घोल ।

क्या हम नही कर सकते कल कल्लोल,
क्यो हो रही  हमारी नित्य क्रिया कपोल ।

इस सृष्टि में क्या हम नही सकते हिल-डोल,
हे मनुज अब तो अपना मनुष्यता का पिटारा खोल ।

जो तेरा है वो मेरा भी है सारा सृष्टि-खगोल,
फिर क्यो बिगाड़ते रहे हो हमारा भूगोल ।

कर दो अर्पण

शहिदों का बलिदान पुकारता
क्यों रो रही है भारत माता ।

उठो वीर जवान बेटो,
भारत माता का क्लेश मेटो ।

क्यों सो रहे हो पैर पसारे
जब छलनी सीने है हमारे ।

तब कफन बांध आये हम समर,
आज तुम भी अब कस लो कमर ।

तब दुश्मन थे अंग्रेज अकेले
आज दुश्मनों के लगे है मेले ।

सीमा के अंदर भी सीमा के बाहर भी,
देष की अखण्ड़ता तोड़ना चाहते है सभी ।

कोई नक्सली बन नाक में दम कर रखा है,
कोई आतंकवादी बन आतंक मचा रखा है ।

चीन की दादागीरी पाक के नापाक इरादे,
कुंभकरणी निद्रा में है संसद के शहजादे ।

अब कहां वक्त है तुम्हारे सोने का,
नाजुक वक्त है इसे नही खोने का ।

ये जमी है तुम्हारी ये चमन हैं तुम्हारे,
तुमही हो माली तुमही हो रखवारे ।

श्वास प्रश्वास कर दो तुम समर्पण,
तन मन सब मां को कर दो अर्पण ।


..............‘‘रमेश‘‘............

वजूद

वजूद,
आपका वजूद
मेरे लिये है,
एक विश्वास ।
एक एहसास .....
खुशियों भरी ।

वजूद,
आपका वजूद
मेरे साथ रहता,
हर सुख में
हर दुख में
बन छाया घनेरी ।

वजूद,
आपका वजूद
मेरा प्यार ..


..............‘‘रमेश‘‘............


वर्षागीत



श्यामल घटा घनेरी छाई,
शीतल शीतल नीर है लाई ।
धरती प्यासी मन अलसाई,
तपते जग की अगन बुझाई ।।

खग-मृग पावन गुंजन करते,
नभगामी नभ में ही रमते ।
हरितमा धरती के आंचल भरते,
रंभाते कामधेनु चलते मचलते ।।

कृषक हल की फाल को भरते,
धान बीज को छटकते बुनते ।
खाद बिखेरते हसते हसते,
धानी चुनरिया रंगते रंगते ।।

सूखी नदी की गोद भरने लगी है,
कल कल ध्वनि बिखेरने लगी है ।
कुछ तटबंध टूट रहे है,
कहीं कहीं मातम फूट रहे हैं ।।

घोर घोर रानी कितना बरसे पानी,
ग्राम ग्राम बच्चे बोल रहे जुबानी ।
रंग बिरंगे तितली रानी तितली रानी,
उमड़ घुमड़ के बरसे पानी बरसे पानी ।।

-रमेश दिनांक 16 जून 2013

............‘रमेश‘...........

कैसे पेश करू

अपने देश का हाल क्या पेश करूं
अपनो को ये नजराना कैसे पेश करूं

सोने की चिडि़या संस्कारो का बसेरा
टूटता बसेरा उड़ती चिडि़या ये चित्र कैसे पेश करू

जिसने किया रंग में भंग देख रह गया दंग
उन दगाबाजो की दबंगई कैसे पेश करू

इस धरा को जिसे दिया धरोहर सम्हालने को
उन रखवारो की चोरी की किस्से कैसे पेश करूं

वो खुद को कहते है दुख सुख का साथी हमारा
भुखो से छिनते निवाले का दृश्य कैसे पेश करूं

सौपी है जिन्हे किस्मत की डोर अपनी
उन पतंगबाजों की पतंगबाजी कैसे पेश करू

सड़क पर जिनका हुआ गुजर बसर
उनके आलीशान कोठी का तस्वीर कैसे पेश करूं

गरीबो की मसीहा बनते फिरते जहां तहां
उनके भीख मांगते कटोरे को कैसे पेश करूं

फाके मस्त रहे जो बरसो उन गलियो पर
उन गलियों का बना गुलदस्ता कैसे पेश करू


..........‘‘रमेश‘‘.........................

जरा समझना भला

ये शब्द कहते क्या है जरा समझना भला
शब्दों से पिरोई माला कैसे लगते हैं भला


दुख की सुख की तमाम लम्हे हैं पिरोये,
विरह की वेदना प्रेम की अंगड़ाई भला

कवि मन केवल सोचे है या समझे भी
उनकी पंक्तिया को पढ़ कर देखो तो भला

जिया जिसे खुद या और किसी ने यहां
अपने कलम से फिर जिंदा तो किया भला

आइने समाज का बना उतारा कागज पर
कितनी सुंदर चित्र उकेरे है देखो तो भला

अगर किसी रंग की कमी हो इन चित्रों पर
उन रंगों को सुझा उन्हे मदद करो तो भला


..........‘‘रमेश‘‘.........................

जिस तरह

मेरे मन मे वह बसी है किस तरह ,
फूलों में सुगंध समाई हो जिस तरह ।

अपने से अलग उसे करूं किस तरह,
समाई है समुद्र में नदी जिस तरह ।

उसके बिना अपना अस्तित्व है किस तरह,
नीर बीन मीन रहता है जिस तरह ।

उसकी मन ओ जाने मेरी है किस तरह,
देह का रोम रोम कहे राम जिस तरह ।

अलग करना भी चाहू किस तरह,
वह तो है प्राण तन में जिस तरह ।

..........रमेश‘......

क्यों रूकते हो



बढ़ने दो इन बढ़े हुये कदमों को, इसे क्यों रोकते हो ।
मंजिल है अभी दूर, कठिनाईयों से क्यों डरते हो ।।

ठान लिये हो जब अपना वजूद बनाना तो क्यो रूकते हो ।
चढ़नी है अभी चढ़ाई तो ऊंचाई देख क्यों डरते हो ।।

रात का अंधेरा सदा छाया रहता है ऐसा तुम क्यो सोचते हो ।
अंधेरे को चिरता दिनकर है आया फिर तुम क्यों रूकते हो ।।

चिंटी कितने बार गिरता फिर सम्हलता है तो तुम क्यों रूके हो।
पक्षी भी तिनके तिनके से घोसला बुने है तो तुम क्यों नही बुनते हो ।।

कौआ भी गागर में कंकड़ डाल पानी पी लिया तो तुम क्यों नही पिते हो ।
छोड़ दुनिया की आस अपने ही दम पर अपना जीवन क्यों नही जिते हो ।।

............‘‘रमेश‘‘.......................

देखी है हमने दुनिया

देखी है हमने दुनिया,
फूक से पहाड उडाने वाले,
कागज की किस्ती भी नही चला पाते है ।

देखी है हमने दुनिया,
आसमान से चांद सितारे तोड लाने वाले,
जीवन भर साथ निभा भी नही पाते ।

देखी है हमने दुनिया,
नैनो की भाषा समझने वाले,
चीख पुकार भी सुन नही पाते ।

देखी है हमने दुनिया,
इश्क को जिस्म की अरमा समझने वाले,
इस जहां में किसी से इश्क निभा  नही पाते ।।

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