‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

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प्रेम और संबंध में पहले आया कौन

/तुकबंदी/ प्रेम और संबंध में पहले आया कौन । जिसने भी सुना यह प्रश्न साध रखा मौन ।। कहने लगे मुर्गी पहले आया कि अंडा । कुछ इसी प्रकार का है यह तुम्हारा फंडा ।। नहीं नहीं आसान है । कहां तुम्हारा ध्यान है ।। अच्छा चलो एक दूसरा प्रश्न पूछते हैं । आओ मिलकर इसी पर  जुझते हैं ।। तुम्हारी मां ने तुझे बेटा मानकर पहले प्यार किया । या...

वो प्यार नहीं तो क्या था?

तेरे नैनों का निमंत्रण पाकर मेरी धड़कन तुम्हारी हुई । मेरे नैना तुम्हारी अंखियों से, पूछा जब एक सवाल तुम में ये मेरा बिम्ब कैसा ? पलकों के ओट पर छुपकर वह बोल उठी- "मैं तुम्हारी दुलारी हुई ।" नैनों की भाषा जुबा क्या समझे कहता है ना तुझसे मेरा वास्ता यह तकरार नहीं तो क्या था ? नयनों ने फिर नैनों से पूछा वो प्यार नहीं तो क्या था ?? -रमेश चौह...

हर संकटों से जुझने का संकल्प दें ।

हे विधाता नही बदनला मुझे तेरा विधान, हर दुःख- सुख में मेरा कर दे कल्याण । चाहे जितना कष्ट मेरे भाग्य में भर दे, पर हर संकटों से जुझने का संकल्प दें । जो संकट आये जीवन में उनसे मैं दो दो हाथ करू, संकट हो चाहे जितना विकट उनसे मै कभी न डरू । चाहे मेरे हर पथ पर कंटक बिखेर दें, पर उन कंटकों में चलने का साहस भर दें । कष्टो से विचलित हो अपनी मानवता...

यही सत्य ही सत्य है

मानों या न मानो यारों यही सत्य ही सत्य है केवल प्यार ही प्यार है प्यार देखता नही कभी मजहब न लड़का न लड़की समझे इसका मतलब प्यार लिंग भेद में है नही यह तो वासना है यारों कभी किसी ने सोचा है केवल युवक और युवती क्यों करते फिरते रहते प्यार, प्यार इस जगती प्यार कैद में होता नही यह तो स्वार्थ है यारों प्यार के दुहाई देने वाले जग के प्यार भूल बैठे हैं जनक...

नारी नर एक समान

नारी तेरे कितनेे रूप, सभी रूप में तू अद्भूत ।मां बहना पुत्री हुई, हुई पत्नि अवधूूत ।। पिता बन कर लालन किये, पति बन कर पालन किये ।हे पुरूष तुम संतान दे, नारी को नारी कियेे ।। सृष्टि मेंं नर नारी का,सत्ता सदा समान है।नर से नारी का और नारी से नर का सम्मान है ।। पूूरक एक दूूसरेे के, बंधे एक दूसरे से ।अस्‍ितत्व नही है, किसी तीसरे से ।। एक महिमा मंडित...

हम आजाद है हम आजाद है

पक्षीय गगन चहके गाते गीत हम आजाद है हम आजाद है नदीयां बहती करती कलकल हम आजाद है हम आजाद है तरू शाखा लहराये और गाये हम आजाद है हम आजाद है मृग उछलते नाचते गाते गीत हम आजाद है हम आजाद है मयूर पसारे पंख नाचे गाये हम आजाद है हम आजाद है तन प्रफूल्लित मन प्रफूल्लित हम आजाद है हम आजाद है मन सोचे प्रकति अनुकूल तन झूमे प्रकृति अनुकूल प्रकृति अनुशासन में रहके...

अब जमाना लग रहे रूपहले

अब जमाना लग रहे रूपहले  याद आ रहा है मुझे  एक बात, मेरे दादाजी ने जो कहे एक रात । धरती पर स्वर्ग लगते थे पहले, अब जमाना लग रहे रूपहले । भुले बिसरे से लगते अब हमारे संस्कार, परम्पराओं पर भारी पड़ रहे अब नवाचार । परम्पराओं पर जान छिड़कते थे लोग पहले, अब जमाना लग रहे रूपहले । मेरे माता पिता ने सिखये जो रीति, तेरे पापा उसे ही तो कह रहे कुरीति...

गुरू

जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू, अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू । कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू, निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू । न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू, चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू । सारे अपराधो से सना तन मन  है मेरा गुरू, अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू । दयावंत आप हे कृपालु...

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से, क्षितिज फलक पर, मैंने एक बिंदु उकेरा है । भरने है कई रंग, अभी इस फलक पर, कुंचे को तो अभी हाथ धरा है । डगमगाती पांव से, अंधेरी डगर पर, चलने का दंभ भरा है । निशा की तम से, चलना है उस पथ पर, जिस पथ पर नई सबेरा है । राही कोई और हो न सही, अपने आशा और विश्वास पर, अपनो का आशीष सीर माथे धरा है...

एक गौरेया की पुकार

एक गौरैया एक मनुज से कहती है ये बोल, हे बुद्विमान प्राणी हमारे जीवन का क्या है मोल । अपने हर प्रगति को अब तो जरा लो तोल, सृष्टि के कण-कण में दिया है तूने विष घोल । क्या हम नही कर सकते कल कल्लोल, क्यो हो रही  हमारी नित्य क्रिया कपोल । इस सृष्टि में क्या हम नही सकते हिल-डोल, हे मनुज अब तो अपना मनुष्यता का पिटारा खोल । जो तेरा है वो मेरा भी...

कर दो अर्पण

शहिदों का बलिदान पुकारता क्यों रो रही है भारत माता । उठो वीर जवान बेटो, भारत माता का क्लेश मेटो । क्यों सो रहे हो पैर पसारे जब छलनी सीने है हमारे । तब कफन बांध आये हम समर, आज तुम भी अब कस लो कमर । तब दुश्मन थे अंग्रेज अकेले आज दुश्मनों के लगे है मेले । सीमा के अंदर भी सीमा के बाहर भी, देष की अखण्ड़ता तोड़ना चाहते है सभी । कोई नक्सली बन नाक में...

वजूद

वजूद, आपका वजूद मेरे लिये है, एक विश्वास । एक एहसास ..... खुशियों भरी । वजूद, आपका वजूद मेरे साथ रहता, हर सुख में हर दुख में बन छाया घनेरी । वजूद, आपका वजूद मेरा प्यार .. ..............‘‘रमेश‘‘...............

वर्षागीत

श्यामल घटा घनेरी छाई, शीतल शीतल नीर है लाई । धरती प्यासी मन अलसाई, तपते जग की अगन बुझाई ।। खग-मृग पावन गुंजन करते, नभगामी नभ में ही रमते । हरितमा धरती के आंचल भरते, रंभाते कामधेनु चलते मचलते ।। कृषक हल की फाल को भरते, धान बीज को छटकते बुनते । खाद बिखेरते हसते हसते, धानी चुनरिया रंगते रंगते ।। सूखी नदी की गोद भरने लगी है, कल कल ध्वनि बिखेरने लगी...

कैसे पेश करू

अपने देश का हाल क्या पेश करूं अपनो को ये नजराना कैसे पेश करूं सोने की चिडि़या संस्कारो का बसेरा टूटता बसेरा उड़ती चिडि़या ये चित्र कैसे पेश करू जिसने किया रंग में भंग देख रह गया दंग उन दगाबाजो की दबंगई कैसे पेश करू इस धरा को जिसे दिया धरोहर सम्हालने को उन रखवारो की चोरी की किस्से कैसे पेश करूं वो खुद को कहते है दुख सुख का साथी हमारा भुखो से छिनते...

जरा समझना भला

ये शब्द कहते क्या है जरा समझना भला शब्दों से पिरोई माला कैसे लगते हैं भला दुख की सुख की तमाम लम्हे हैं पिरोये, विरह की वेदना प्रेम की अंगड़ाई भला कवि मन केवल सोचे है या समझे भी उनकी पंक्तिया को पढ़ कर देखो तो भला जिया जिसे खुद या और किसी ने यहां अपने कलम से फिर जिंदा तो किया भला आइने समाज का बना उतारा कागज पर कितनी सुंदर चित्र उकेरे है देखो...

जिस तरह

मेरे मन मे वह बसी है किस तरह , फूलों में सुगंध समाई हो जिस तरह । अपने से अलग उसे करूं किस तरह, समाई है समुद्र में नदी जिस तरह । उसके बिना अपना अस्तित्व है किस तरह, नीर बीन मीन रहता है जिस तरह । उसकी मन ओ जाने मेरी है किस तरह, देह का रोम रोम कहे राम जिस तरह । अलग करना भी चाहू किस तरह, वह तो है प्राण तन में जिस तरह । ..........रमेश‘.......

क्यों रूकते हो

बढ़ने दो इन बढ़े हुये कदमों को, इसे क्यों रोकते हो । मंजिल है अभी दूर, कठिनाईयों से क्यों डरते हो ।। ठान लिये हो जब अपना वजूद बनाना तो क्यो रूकते हो । चढ़नी है अभी चढ़ाई तो ऊंचाई देख क्यों डरते हो ।। रात का अंधेरा सदा छाया रहता है ऐसा तुम क्यो सोचते हो । अंधेरे को चिरता दिनकर है आया फिर तुम क्यों रूकते हो ।। चिंटी कितने बार गिरता फिर सम्हलता...

देखी है हमने दुनिया

देखी है हमने दुनिया, फूक से पहाड उडाने वाले, कागज की किस्ती भी नही चला पाते है । देखी है हमने दुनिया, आसमान से चांद सितारे तोड लाने वाले, जीवन भर साथ निभा भी नही पाते । देखी है हमने दुनिया, नैनो की भाषा समझने वाले, चीख पुकार भी सुन नही पाते । देखी है हमने दुनिया, इश्क को जिस्म की अरमा समझने वाले, इस जहां में किसी से इश्क निभा  नही पाते ...

मधुर मधुर याद

मधुर मधुर याद है आती, मन को नये पंख लगाती । संस्मरण आकाश में उड़ती, मन कलरव गानसुनाती ।। बालगीत गाकर मुझको मां के गोद में सुलाती । लोरी गा थपकी दे कर नींदिया को है बुलाती । मित्रों की आवाज दे बचपना याद दिला रहे  । कंचे, गिल्ली-डंडा,  सब कुछ याद आ रहे । स्कूल का बस्ता, गुरूजी का बेद कहां भुलाये ।  गुरूजी का ज्ञान जीवन में आज काम...

बढ़ने दो इन बढ़े हुये कदमों को

बढ़ने दो इन बढ़े हुये कदमों को, इसे क्यों रोकते हो । मंजिल है अभी दूर, कठिनाईयों से क्यों डरते हो ।। ठान लिये हो जब अपना वजूद बनाना तो क्यो रूकते हो । चढ़नी है अभी चढ़ाई तो ऊंचाई देख क्यों डरते हो ।। रात का अंधेरा सदा छाया रहता है ऐसा तुम क्यो सोचते हो । अंधेरे को चिरता दिनकर...

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