जनता मेरे देश का, दिखे विवश लाचार ।
अँकुश व्यपारी पर नहीं, सौ का लिए हजार ।।
सौ का लिए हजार, सभी लघु दीर्घ व्यपारी ।
लाभ नीति हो एक, देश में अब सरकारी ।।
कितना लागत मूल्य, बिक्री का कितना तेरे ।
ध्यान रखें सरकार, विवश हैं जनता मेरे ।।
जनता मेरे देश का, दिखे विवश लाचार ।
अँकुश व्यपारी पर नहीं, सौ का लिए हजार ।।
सौ का लिए हजार, सभी लघु दीर्घ व्यपारी ।
लाभ नीति हो एक, देश में अब सरकारी ।।
कितना लागत मूल्य, बिक्री का कितना तेरे ।
ध्यान रखें सरकार, विवश हैं जनता मेरे ।।
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...
0 Comments:
एक टिप्पणी भेजें