रे
इंसा
कट्टर
बनकर
क्यों लगाते हो
घोसलों में आग
जहां तेरा घरौंदा।।
इंसा
कट्टर
बनकर
क्यों लगाते हो
घोसलों में आग
जहां तेरा घरौंदा।।
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...
0 Comments:
एक टिप्पणी भेजें