खाता था छत्तीसगढ़, था पहले से बोध ।
खाकर बासी प्याज, काम पर थे सब जाते ।।
चटनी संग "रमेेश", खाइये छोड़ उदासी ।
भात भिगाकर रात, बनाई जाती बासी ।।
Ramesh Kumar Chauhan
विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।
Manwata kaha hai ?
AAPNI AAKHO SE DEKHO
MAI DESH KA ..
अभी तो पैरों पर कांटे चुभे है,
पैरों का छिलना बाकी है
जीवन एक दुश्कर पगडंडी
सम्हल-सम्हल कर चलने पर भी
जहां खरोच आना बाकी है
चिकनी सड़क पर हमराही बहुत है
कटिले पथ पर पथ ही साथी
जहां खुद का आना बाकी है
चाहे हँस कर चलें हम
चाहे रो कर चलें हम
चलते-चलते गिरना
गिर-गिर कर सम्हलना
यही जीवन का झांकी
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...