मुखड़ा (युगल)
आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में
आज बंधे दो मन एक डोर में
अंतरा 1 (स्त्री स्वर)
अजनबी थे हम कल तक
आज साथी इस जीवन
माथे की इस सिंदूरी रेखा में
मेरे सपने होकर सजते हो
नयनों में रूप तुम्हारा
होंठों पे तू ही मुस्कान
मन ही मन स्वीकार किया
तुम्हें मैंने अपना प्राण
अंतरा 2 (पुरुष स्वर)
पहली बार जब देखा तुम्हें
मन ठहर-सा गया
तेरी पायल की धुन से
तन मन हर्षित हो गया
कंगन की खनक सुन मन कहता है
हर सुख-दुख मैं हर पल साथ रहूँ
तेरी हँसी, तेरी आँखों में ही
अपना पूरा संसार कहूँ
मुखड़ा (युगल)
आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में
आज बंधे दो मन एक डोर में
अंतरा 3 (युगल धीमी लय)
तुम मेरे मन का श्रृंगार बनो
मैं तुम्हारी धीरज बन जाऊँ
तन से पहले मन मिल जाए
ऐसा प्रेम विधान निभाऊँ
मर्यादा मेरी भूषण हो
श्रद्धा मेरी पहचान
संग-संग चलकर रच देंगे
स्नेह, समर्पण, सम्मान
अंतरा 4 (स्त्री)
मेरी चूड़ी, मेरी बिंदी
तुम्हारे नाम सजी
तुम्हारी एक दृष्टि में ही
मेरी दुनिया बस गई
अंतरा 5 (पुरुष)
तेरी लाज मेरी मर्यादा
तेरी खुशी मेरा मान
जीवन भर का वचन यही
तू मेरा अभिमान
अंतिम मुखड़ा (युगल)
आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में
आज बंधे दो मन एक डोर में









