‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है

विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

गीत : आज बंधे दो मन एक डोर में

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 1 (स्त्री स्वर)
अजनबी थे हम कल तक
आज साथी इस जीवन
माथे की इस सिंदूरी रेखा में
मेरे सपने होकर सजते हो

नयनों में रूप तुम्हारा
होंठों पे तू ही मुस्कान
मन ही मन स्वीकार किया
तुम्हें मैंने अपना प्राण 

अंतरा 2 (पुरुष स्वर)
पहली बार जब देखा तुम्हें
मन ठहर-सा गया
तेरी पायल की धुन से
तन मन हर्षित हो गया

कंगन की खनक सुन मन कहता है
हर सुख-दुख मैं हर पल साथ रहूँ
तेरी हँसी, तेरी आँखों में ही
अपना पूरा संसार कहूँ

मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में

अंतरा 3 (युगल धीमी लय)
तुम मेरे मन का श्रृंगार बनो
मैं तुम्हारी धीरज बन जाऊँ
तन से पहले मन मिल जाए
ऐसा प्रेम विधान निभाऊँ

मर्यादा मेरी भूषण हो
श्रद्धा मेरी पहचान
संग-संग चलकर रच देंगे
स्नेह, समर्पण, सम्मान

अंतरा 4 (स्त्री)
मेरी चूड़ी, मेरी बिंदी
तुम्हारे नाम सजी
तुम्हारी एक दृष्टि में ही
मेरी दुनिया बस गई

अंतरा 5 (पुरुष)
तेरी लाज मेरी मर्यादा
तेरी खुशी मेरा मान
जीवन भर का वचन यही
तू मेरा अभिमान

अंतिम मुखड़ा (युगल)

आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में

आज बंधे दो मन एक डोर में


मेरे गांव में

बेजाकब्जा का दौर
बेजाकब्जा का दौर
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
अंतरा 1
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
घर में था चौरा , अब चौरे में घर 
बेजाकब्जा का दौर,
किसी को किसी का कहां डर 
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 2
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
गलियाँ कभी चौड़ी थी,, अब क्यों सिकुड़ गया
बच्चे खेल खेलें कहां अब
गली आँगन उजड़ गया
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 3
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
खेतों के पास गोचर, गोचर के पास खेत
बेजाकब्जा का दौर,
गोचर ही हो गया खेत
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 4
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
नदिया की पीड़ा अब सुने कौन 
बेजाकब्जा का दौर,
नदियों का कल-कल मौन
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 5
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बस्ती में था तालाब , अब तालाब में बस्ती
बेजाकब्जा का दौर,
खो गई जीवन की मस्ती
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

अंतरा 6
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली 
गायों का गौठान, और गोचर की हरियाली
बेजाकब्जा का दौर,
बचे न कहीं भूमि खाली
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

मुखड़ा (दोहराव)
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को
मेरे गाँव में, देखे कौन गाँव को

ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे  बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

मेरे मोहल्ले की वह गली,
जिसकी चौड़ी थी छाती ।
जहां खड़ी होती थी 
एक साथ चार-चार बैलगाड़ी
सकरी संकल सा राह पर
ढूंढ नहीं पा रहा उसे मैं अनाड़ी 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

जहां हम सब खेला करते
दांव पेच हुंकार भरते 
मेरी गौ का गोचर भूमि 
और गौठान मेरे गांव   
ढूंढ रहा मैं डगर-डगर
लेकर अपनी यादों की छांव ।

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

नदी का वह  कल-कल पानी 
तालाब का लहरता रवानी 
मेरी मां का वह पनघट
और घाट-बाट का खटपट 
ढूंढ रहा मैं होकर आकुल
आहें लंबी और मन व्याकुल 

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 

लालच लोभ लोगों पर
पांव से सिर तक चढ़ा 
इंच-इंच जमीन डकार कर
दोष सरकार पर मढ़ा 
बड़ा है हर भ्रष्टाचार से 
मन क्षुब्ध हैं ऐसे व्यवहार से

ढूंढ़ो ढूंढ़ो 
ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे मितवा मेरे 
खो गया गांव मेरे बचपन का ।
ढूंढ़ो ढूंढ़ो 


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