एक मंत्र है तंत्र का, खटमल बनकर चूस।
झोली बोरी छोड़कर, बोरा भरकर ठूस ।।
दंग हुआ यह देख कर, रंगे उनके हाथ ।
मूक बधिर बन आप ही, जिनको देते साथ ।।
Ramesh Kumar Chauhan
विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।
Manwata kaha hai ?
AAPNI AAKHO SE DEKHO
MAI DESH KA ..
घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
-रमेश चौहान
तोड़ें उसके दंभ को, दिखा रहा जो चीन ।
चीनी हमें न चाहिये, खा लेंगे नमकीन ।।
राष्ट्र प्रेम के तीर से, करना हमें शिकार ।
बचे नही रिपु एक भी, करना ऐसे वार ।।
- रमेश चौहान
विजयादशमी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं
विजयादशमी पर्व पर, कर लें विजयी नाद ।
गढ़ने निज व्यवहार को, करें राम को याद ।।
करें राम को याद, बने हम कैसे मानव ।
मानवता पथ छोड़, बने क्यों रे हम दानव ।
रक्षा करने धर्म, लीजिये कसमा-कसमी ।
सार्थक तब तो होय, पर्व यह विजयादशमी ।।
-रमेश चौहान
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...