घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
-रमेश चौहान
घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
-रमेश चौहान
मुखड़ा (युगल) आज बंधे दो मन एक डोर में सपनों की उजली भोर में तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में आज बंधे दो मन एक डोर में अ...
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