कौन सुने हिन्दू की बातें, गैर हुये कुछ अपने ।
कुछ गहरी निद्रा में सोये, देख रहें हैं सपने ।।
गढ़ सेक्यूलर की दीवारे, अपने हुये पराये ।
हिन्दूओं की बातें छोड़ो, हिन्दू जिसे न भाये ।।
धर्म निरपेक्ष का चोला धर, बनते उदारवादी ।
राजनीति में माहिर वो तो, केवल अवसरवादी ।।
उनको माने सोने चांदी, हमको सिक्के खोटे ।
उनके जुकाम भारी लगते, घाव हमारे छोटे ।।
अंधे बहरे हो जाते क्यों, वो मानवतावादी ।
अत्याचार दिखे ना उनको, जब हिन्दू फरयादी ।
ऐसे लोगो की कमी नही, जो अपने में खोये ।
दूजे की जो चिंता छोड़े, पैर पसारे सोये ।।
नहीं हमारा बैरी दूजा, शत्रु यही हैं सारे ।
आजादी से लेकर अबतक, जो हमको हैं मारे ।
कौन निकाले हैं पंडित को, जो घाटी में खेले ।
उनके आंखों के आंसू भी, जिनको लगे झमेले ।।
मेरी धरती मेरा अंबर, फिर भी मैं बेगाना ।
जहां अल्प संख्यक है हिन्दू, वहां बने ‘कैराना’ ।।
परहेज हमें क्यों कर होगा, बरकत होवे सबका ।
हिन्दू इस धरती के जाये, क्यों फिर कुचला तबका ।
जागो हिन्दू अब तो जागो, गहरी निद्रा छोड़ो ।
अस्तित्व बचाने तुम अपना, बैरी का मुख तोड़ो ।।
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