देर है अंधेर नहीं
जन्म से अब तक
सुनते आ रहे हैं
एक प्रश्न
छाती तान कर खड़ा है
न्याय में देरी होना क्या न्याय हैं ?
एक प्रश्न खड़ा है
आरोपियों को दोषियों की तरह
सजा क्यों दी जाती है ?
क्या सभी आरोपी दोषी सिद्ध होते है ?
यदि हां तो
वर्षों तक कोर्ट का चक्कर क्यों ?
यदि नहीं तो
आरोपी के अनमोल वर्ष जो जेल में बीते,
दुख अपमान कष्ट में बीते,
उन क्षणों का भुगतान कौन करे ?
क्या कभी
झूठे आरोप लगाने वालों को सजा हुई है ?
क्या कोई कभी
इस सिस्टम पर प्रश्न खड़ा किया है ?
क्या कोई संगठन
उन निर्दोष आरोपियों के पक्ष में
प्रदर्शन किया है ?
सभी आरोपी दोषी नहीं होते
तो क्यों
आरोपियों को दोषियों की भांति सजा दी जाती है
क्यों क्यों क्यों
आखिर क्यों ?????
आखिर क्यों ??
तीन तरह के लोग
एक समय को भूल कर, भोग रहे हैं भोग ।।
भोग रहे हैं भोग, जगत में असफल होकर ।
कोस रहें हैं भाग्य, रात दिन केवल सो कर ।।
एक सफल इंसान, एक पल ना जो खोते ।
कुछ ही लोग महान, समय से आगे होते ।
कुछ दोहा
नष्ट मूल से कीजिये, आये सबको रास ।।
राम दूत हनुमान को, बारम्बार प्रणाम ।
कुछ दोहे
सोच सकारात्मक लिये, तुम्हे दिखाना सूझ ।।
अपनी भाषा में लिखो, अपने मन की बात ।
हिंदी से ही हिंद है, जिसमें प्रेम समात ।।
गद्दारों को मार गिराओ , बैरी खुद मर जाए ।।
फिर भी दिखते आज क्यों, विकृत प्रेम का वेश ।।
मेरे जीवन में रहे, प्रतिपल प्रेम अशेष ।।
जिसको अपना कह थके, लगने लगते भिन्न ।।
देख रही जनता अभी, उनके सारे काम ।
जात-पात के नाम पर, चखे राजसी भोग ।।
सरल सहज इतना सहज, देते सभी दलील ।।
सद्गुण निज अंतस भरे, यही धर्म की रीत ।
जीव-जीव निर्जीव पर, करते रहते स्नेह ।
मन का हर संकल्प ही, खुले नयन की बात ।
हार हार के अंत में, छुपा जीत का जश्न ।।
फिर निश्चित है देखना, मंजिल तेरे पास ।।
दोनों रेखा एक हो, लगे न मन को चोट ।।
चलने जो तैयार थे, छोड़ दिए अब साथ ।।
आस्था
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे का
संत फकीर गुरु
पैगंबर ईश्वर का
अस्तित्व है
केवल मेरी मान्यता से
जिससे जन्मी है
मेरी आस्था ।
मेरी आस्था
किसी अन्य की आस्था से
कमतर नहीं है
न हीं उनकी आस्था
मेरी आस्था से कमतर है
फिर भी लोग क्यों
दूसरों की आस्था पर चोट पहुंचाकर
खुद को बुद्धिजीवी कहते हैं ।
मुझे अंधविश्वासी कहने वाले खुद
पर झांक कर देखें
कितने अंधविश्वास में स्वयं जीते हैं ।
हर सवाल का जवाब एक सवाल
हर सवाल के जवाब से
पैदा होता है
एक नया सवाल
जिसका जवाब
पैदा करता है
पुन:
एक नया सवाल
सवालों के जवाबों का
चल पड़ता है
लक्ष्यहीन भटकाव
इसमें ठहराव तब आता है
जब सवाल का जवाब
एक सवाल ही हो
क्योंकि
हर सवाल का जवाब
केवल
एक सवाल होता है ।
जीने की कला
जग में जीने की कला, जग से लेंवे सीख ।
जीवन जीने की कला, मिले न मांगे भीख ।।
मिले न मांगे भीख, सफलता की वह कुंजी ।
व्यक्ति वही है सफल, स्वेद श्रम जिनकी पूंजी ।।
चलते रहो "रमेश", रक्त बहते ज्यो रग में ।
चलने का यह काम, नाम है जीवन जग में ।।
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