‘नवाकार’

‘नवाकार’ हिन्दी कविताओं का संग्रह है,विशेषतः शिल्प प्रधन कविताओं का संग्रह है जिसमें काव्य की सभी विधाओं/शिल्पों पर कविता प्राप्त होगीं । विशषेकर छंद के विभिन्न शिल्प यथा दोहा, चौपाई कवित्त, गीतिका हरिगीतिका, सवैया आदि । जपानी विधि की कविता हाइकु, तोका, चोका । उर्दु साहित्य की विधा गजल, मुक्तक आदि की कवितायें इसमें आप पढ़ सकते हैं ।

Nawakar

Ramesh Kumar Chauhan

कुछ दोहे

एक दीप तुम द्वार पर, रख आये हो आज । अंतस अंधेरा भरा, समझ न आया काज ।। आज खुशी का पर्व है, मेटो मन संताप । अगर खुशी दे ना सको, देते क्यों परिताप ।। पग पग पीडि़त लोग हैं, निर्धन अरू धनवान । पीड़ा मन की छोभ है, मानव का परिधान ।। काम सीख देना सहज, करना क्या आसान । लोग सभी हैं जानते, धरे नही हैं ध्यान ।। मन के हारे हार है, मन से तू मत हार । काया मन...

दीप पर्व है

     दीप पर्व है     अज्ञानता को मेटो     ज्ञान दीप ले     मानवता को देखो     प्रेम ही प्रेम भरा      नन्हे दीपक     अंधियारा हरते     राह दिखाते     स्वयं अंधेरे बैठे     घमंड छोड़ कर    ...

भारतीय रेल

रेल के रेलम पेल में, जल्दबाजी के खेल में, छत पर चढ़ रहे, देखो नर नारीयां । जान जोखिम में डाल, गोद में बच्चे सम्हाल, दिखा रहें हैं वीरता, दक्ष सवारीयां ।। अबला सबला भई, दुर्गावती लक्ष्मी बन, लांघ रही वह बोगी, छत में ठौर पाने । कौन इन्हें समझायें, जीवन मोल बतायें, क्यों करते नादानी, रेल के दीवाने ।। रेल-रेल भारतीय रेल, रेल है ऐसा जिसके़, अंदर को कौन...

नित्य-नित्य पखारते, चरण वतन के

मां भारती के शान को, अस्मिता स्वाभिमान को, अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के । सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण, चौकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के । चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर, जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के । खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर, लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के । हाथ कूदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये, श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक...

फैंशन के चक्कर में (घनाक्षरी छंद)

फैंशन के चक्कर में, पश्चिम के टक्कर में भूले निज संस्कारों को, हिन्द नर नारियां । अश्लील गीत गान को, नंगाय परिधान को शर्म हया के देश में, मिलती क्यों तालियां । भाई कहके नंगों को, दादा कह लफंगो को, रक्त जनित संबंधो को, दे रहे क्यों गालियां । दुआ-सलाम छोड़ के, राम से नाता तोड़ के हाय हैलो बोल-बोल, हिलाते हथेलियां । हया रखे ताक पर, तंग वस्त्र धार कर, लोकलाज...

जग की यह माया

आत्मा अमर शरीर छोड़कर घट अंदर तड़पती रहती ऊहा पोह मे इच्छा शक्ति के तले असीम आस क्या करे क्या ना करे नन्ही सी आत्मा भटकाता रहता मन बावला प्रपंच फंसकर जग ढूंढता सुख चैन का निंद जगजाहिर मन आत्मा की बैर घुन सा पीसे पंच तत्व की काया जग की यह मा...

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