शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

"देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में"


( उल्लाल छंद)

देश हमारा हम देश के, देश हमारा मान है ।
मातृभूमि ऊंचा स्वर्ग से, भारत का यश गान है ।।
देश एक है सागर गगन  एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

धर्म हमारा हम धर्म के, जिस पर हमें गुमान है ।
धर्म-कर्म जीवन में दिखे,जो खुद प्रकाशवान है ।।
फंसे रहेंगे कब तलक हम, पाखंडियों के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

जाति हमारी हम जाति के,  जिस पर हम को मान है ।।
जाति-पाति से पहले वतन, ज्यों काया पर प्राण है ।।
बटे  रहेंगे कब तलक हम, जाति- पाति जंजाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

अपने का अभिमान है जब, दूजे का भी मान हो ।
अपना अपमान बुरा लगे जब, दूजे का भी भान हो ।।
फंसे रहेंगे कब तलक हम,  नेताओं के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

जाति सत्य इस देश में

कभी जाट पटेल कभी, कभी और का दांव ।
करणी सेना बाद अब, देखो कोरेगांव ।।
जाति मान अभिमान है, बड़ा जाति अपमान ।
जाति सत्य इस देश में, देखें देकर ध्यान ।।
राजनीति के खेल में, चले जाति का खेल ।
दंगा दंगा में दिखे, जाति पंथ का मेल ।।
केवल प्रेम विवाह में, अंधे होते लोग ।
जात पात को छोड़कर, भोग रहे हैं भोग ।।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दासता गढ़ते नव

नव अंग्रेजी वर्ष में, युवा मस्त हैं हिंद ।
भारतीय परिवेश को, भूल आंग्ल के बिंद ।।
भूल आंग्ल के बिंद, दासता किसको कहते ।
तज अपनी पहचान, दासता में ही रहते ।
तजे देह जब श्वास, नाम होता उसका शव ।
वैचारिक परतंत्र, दासता गढ़ते नव ।।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

प्रेमी पागल एक सा

प्रेमी पागल एक सा, जैसे होते भक्त ।
होकर जगत निशक्त वह, प्रेमी पर आसक्त ।।

चंदन तरु सम प्रेम है, जिसका अचल सुगंध ।
गरल विरह की वेदना, सुधा मिलन अनुबंध ।।

उलझ गया है न्याय

मुझ से बढ़कर तंत्र है, सोच रहा है राम ।
बाबर पहले या अवध, किससे मेरा नाम ।।

भारत के इस तंत्र में, उलझ गया है न्याय ।
राम पड़ा तिरपाल पर, झेल रहा अन्याय ।।

राष्ट्रवाद

धर्मवाद के फेर में, राष्ट्रवाद है फेल ।
खेलें हैं जब धर्म पर, राजनीति का खेल ।

राजनीति में मान कर, जाति धर्म में भेद ।
मतदाता को बांटना, लोकतंत्र का छेद ।।

आन-बान इस देश का, जो रखते सम्हाल ।
जीते रहते देश पर, लिये मौत का ढाल ।।

राष्ट्रवाद पर प्रश्न क्यों, खड़ा किये हैं लोग ।
जिसके कारण आज तो, दिखे देश में रोग ।।

निज मौलिक कर्तव्य है, राष्ट्रवाद का धर्म ।
सर्वधर्म सम्भाव का, छुपा रखा जो मर्म ।।


हिन्दी हिन्दू हिन्द का, होता रहा जब क्षीण ।
होता ना क्यों कर यहां, राष्ट्रवाद बलहीन ।।

आखिर किस आथार पर, बना हिन्द अरु पाक ।
आखिर किसने है किया, राष्ट्रवाद को खाक ।।


करते रहिये काम

देखे कई पड़ाव हम, निज जीवन के राह ।
कितने ढ़ाल चढ़ाव हैं, पाया किसने थाह ।।

लोभ-मोह अरु स्वार्थ का, माया ठगनी नाम ।
प्रीत-प्रेम उपकार ही, रचे जगत सत धाम ।।

बेटा तुझको क्या समझ, पैसों का परिताप ।
खून-पसीना बेच कर, पैसा लाता बाप ।।

मोटर गाड़ी बंगला, और बैंक बैलेंस ।
छोड़ बड़ा संतोष धन, सभी इसी के फैंस ।।

राग द्वेश को छोड़ कर, करते रहिये काम ।
कर्म हस्तगत आपके, हस्त नहीं परिणाम ।।