1.
ढलती शाम
दिन का अवसान
देती विराम
भागम भाग भरी
दिनचर्या को
आमंत्रण दे रही
चिरशांति को
निःशब्द अव्यक्त
बाहें फैलाय
आंचल में ढक्कने
निंद में लोग
होकर मदहोश
देखे सपने
दिन के घटनाएं
चलचित्र सा
पल पल बदले
रोते हॅसते
कुछ भले व बुरे
वांछित अवांछित
आधे अधूरे
नयनों के सपने
हुई सुबह
फिर भागम भाग
अंधड़ दौड़
जीवन का अस्तित्व
आखीर क्या है
मृत्यु के शैय्या पर
सोच...
प्रीत के दोहे
मेहंदी तेरे नाम की, रचा रखी है हाथ ।
जीना मरना है मुझे, अब तो तेरे साथ ।।
रूठी हुई थी भाग्य जो, मोल लिया जब शूल ।
तेरे कारण जगत को, मैंने समझी धूल ।।
तेरी मीठी बात से, हृदय गई मैं हार ।
तेरी निश्चल प्रीत पर, तन मन जाऊॅ वार ।।
देखा जब से मैं तुझे, सुध बुध गई विसार ।
मीरा बन मैं श्याम पर, सब कुछ किया निसार ।।
खोले सारे भेद को, मेरे दोनों नैन ।
नहीं...
लोकतंत्र का कमाल देखो (सार छंद)
लोकतंत्र का कमाल देखो, हमसे मांगे नेता ।
झूठे सच्चे करते वादे, बनकर वह अभिनेता ।।
लोकतंत्र का कमाल देखो, रंक द्वार नृप आये ।
पाॅंच साल के भूले बिसरे, फिर हमको भरमाये ।।
लोकतंत्र का कमाल देखो, नेता बैठे उखडू ।
बर्तन वाली के आगे वह, बने हुये है कुकडू ।।
लोकतंत्र का कमाल देखो, एक मोल हम सबका ।
ऊॅंच नीच देखे ना कोई, है समान हर तबका ।।
लोकतंत्र...
चुनावी दोहे
लोकतंत्र के राज में, जनता ही भगवान ।
पाॅंच साल तक मौन रह, देते जो फरमान ।
द्वार द्वार नेता फिरे, जोड़े दोनो हाथ ।
दास कहे खुद को सदा, मांगे सबका साथ ।।
एक नार थी कर रही, बर्तन को जब साफ ।
आकर नेता ने कहा, करो मुझे तुम माफ ।
काम पूर्ण कर ना सका, जो थी मेरी बात ।
पद गुमान के फेर में, भूल गया औकात ।।
निश्चित ही इस बार मैं, कर दूंगा सब काज ।
समझ मुझे...
एक मुठ्ठी की भांति (तांका)
1.
क्यों भूले तुम ?
अपनी मातृभाषा
माॅं का आॅंचल
कभी खोटा होता है ?
खोटी तेरी किस्मत ।
2.
दूर के ढोल
मधुर लगे बोल
नभ में सूर्य
धरातल से छोटा
बहुत सुहाना है ।
3.
आतंकवाद
धार्मिक कट्टरता
नही सीखाता
बाइबिल कुरान
हिन्द का गीता पुराण ।
4.
स्वीकार करें
दूसरो का सम्मान
क्यों थोपते हो ?
पंथ धर्म विचार
सभी खुद नेक हैं ।
5.
गरज रहा
आई.एस.आई.ई
सचेत रहे
हिन्दू...
छोड़ो झगड़ा नाम का
छोड़ो झगड़ा नाम का, ईश्वर अल्ला एक ।
खुदा की खुदाई भली, प्रभु की प्रभुता नेक ।।
धर्म धरे विश्वास से, सभी धर्म है नेक ।
कट्टरता के शूल से, मानव पथ ना छेक ।।
मानवता के राह चल, आप मनुष्य महान ।
दीन हीन को साथ ले, गढ़ लें रम्य जहान ।।
दीन हीन सब तृप्त हो, सुख मय हो दिन रैन ।
भेद भाव अब खत्म हो, मिले सभी को चैन ।।
अपनी सेवा आप कर, निज रूप को...
बंधन
मृत्युलोक माया मोह अमर । मोह पास ही जग लगे समर
लोग कहे यह मेरा अपना । संत कहे जगत एक सपना
जीते जो जग में यह माया । मिट्टी समझे अपनी काया
स्वार्थ के सब रिश्ते नाते । स्नेही जीवन अनमोल बनाते
आसक्ति प्रीत में भेद करें । कमल पत्र सा निर्लिप्त रहे
है अनमोल प्रीत का बंधन । रहे सुवासित जैसे चं...
कब समझेगा मर्म रे
हिन्दू मुस्लिम राग, छोड़ दे रे अब बंदे ।
कट्टरता को छोड़, छोड़ सब गोरख धंधे ।।
धर्म पंथ का काज, करे पावन तन मन को ।
पावन पवित्र स्नेह, जोड़ती है जन जन को ।।
राग द्वेष को त्याग कर अब, कर ले सब से प्रेम रे ।
मानव मानव सब एक है, कब समझेगा मर्म रे ...
द्वारिका पुरी सुहानी रे भैया
द्वारिका पुरी सुहानी रे भैया
नही कोई इसका सानी है ।
बांके बिहारी तो यहां है रहते-2
जहां उसकी राजधानी है ।।
सागर श्याम को जगह है दीन्हो
विश्वकर्मा ने यह रचना है कीन्हो
कान्हा अपना वास जहां है लीन्हो
वसे है जहां उसके पटरानी रे भैया
नही कोई इसका सानी है ।
ऊंचे ऊंचे जहां महल अटारी
रथ घोड़े का अद्भूत सवारी
देखे भौचक्क सुदामा संगवारी
आंख भर आये हैं पानी...
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
ग्वाला रे गोकुल के
हाहा हाहा हाहा
गोकुल के ग्वाला, गोकुल के ग्वाला
छेड़े है मुख लगाये घोले रे हाला मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे...
बड़ा तंग किना (भजन)
ओ मईयाजी ........
बड़ा तंग किन्हा
तेरे किसन ने बड़ा तंग किना -2
दूध दही चुराये, संग साथी बुलाये,
घर घुस चढ़ जावे ये जिना
बड़ा तंग किन्हा
तेरे किसन ने बड़ा तंग किना
ओ मईयाजी ........
बड़ा तंग किन्हा
ओ ग्वाला है हम ग्वालिन हैं-2
ओ बगिया है हम मालिन हैं
तेरे घर में माखन, खूब होगी मगर
उसने मेरा माखन छिना
बड़ा तंग किना 2
तेरे किसन ने बड़ा तंग किना
बड़ा...
नेताजी की महिमा गाथा (आल्हा)
नेताजी की महिमा गाथा, लोग भजन जैसे है गाय ।
लोकतंत्र के नायक वह तो, भाव रंग रंग के दिखाय ।।
नटनागर के माया जैसे, इनके माया समझ न आय ।
पल में तोला पल में मासा, कैसे कैसे रूप बनाय ।।
कभी कभी जनता संग खड़े, जन जन के मसीहा कहाय ।
मुफ्त बांटते राशन पानी, लेपटाप बिजली भरमाय ।
कभी मंहगाई पैदा कर, दीन दुखीयों को तड़पाय ।
बांट बेरोजगारी भत्ता, युवा शक्ति...
कर्तव्य क्या है ?
कर्तव्य क्या है ?
कोई नही जानते
ऐसा नही है
कोई नही चाहते
कांटो पर चलना ।
स्वार्थ के पर
एक मानव अंग
मानवीकृत
मांगते अधिकार
कर्तव्य भूल कर ।
लड़े लड़ाई
अधिकारों के लिये
अच्छी बात है
रखें याद यह भी
कुछ...
काले धन का हल्ला
छन्न पकैया छन्न पकैया, काले धन का हल्ला ।
चोरों के सरदारों ने जो, भरा स्वीस का गल्ला ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, कौन जीत अब लाये ।
चोर चोर मौसेरे भाई, किसको चोर बताये ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, सपना बहुत दिखाये ।
दिन आयेंगे अच्छे कह कह, हमको तो भरमाये ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, धन का लालच छोड़ो ।
होते चार बाट चोरी धन, इससे मुख तुम मोड़ो ।।
छन्न पकैया...
कुछ दोहे
एक दीप तुम द्वार पर, रख आये हो आज ।
अंतस अंधेरा भरा, समझ न आया काज ।।
आज खुशी का पर्व है, मेटो मन संताप ।
अगर खुशी दे ना सको, देते क्यों परिताप ।।
पग पग पीडि़त लोग हैं, निर्धन अरू धनवान ।
पीड़ा मन की छोभ है, मानव का परिधान ।।
काम सीख देना सहज, करना क्या आसान ।
लोग सभी हैं जानते, धरे नही हैं ध्यान ।।
मन के हारे हार है, मन से तू मत हार ।
काया मन...
दीप पर्व है
दीप पर्व है
अज्ञानता को मेटो
ज्ञान दीप ले
मानवता को देखो
प्रेम ही प्रेम भरा
नन्हे दीपक
अंधियारा हरते
राह दिखाते
स्वयं अंधेरे बैठे
घमंड छोड़ कर
...
भारतीय रेल
रेल के रेलम पेल में, जल्दबाजी के खेल में, छत पर चढ़ रहे, देखो नर नारीयां ।
जान जोखिम में डाल, गोद में बच्चे सम्हाल, दिखा रहें हैं वीरता, दक्ष सवारीयां ।।
अबला सबला भई, दुर्गावती लक्ष्मी बन, लांघ रही वह बोगी, छत में ठौर पाने ।
कौन इन्हें समझायें, जीवन मोल बतायें, क्यों करते नादानी, रेल के दीवाने ।।
रेल-रेल भारतीय रेल, रेल है ऐसा जिसके़, अंदर को कौन...
नित्य-नित्य पखारते, चरण वतन के
मां भारती के शान को, अस्मिता स्वाभिमान को,
अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के ।
सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण,
चौकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के ।
चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर,
जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के ।
खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर,
लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के ।
हाथ कूदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये,
श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक...
फैंशन के चक्कर में (घनाक्षरी छंद)
फैंशन के चक्कर में, पश्चिम के टक्कर में
भूले निज संस्कारों को, हिन्द नर नारियां ।
अश्लील गीत गान को, नंगाय परिधान को
शर्म हया के देश में, मिलती क्यों तालियां ।
भाई कहके नंगों को, दादा कह लफंगो को,
रक्त जनित संबंधो को, दे रहे क्यों गालियां ।
दुआ-सलाम छोड़ के, राम से नाता तोड़ के
हाय हैलो बोल-बोल, हिलाते हथेलियां ।
हया रखे ताक पर, तंग वस्त्र धार कर,
लोकलाज...
जग की यह माया
आत्मा अमर
शरीर छोड़कर
घट अंदर
तड़पती रहती
ऊहा पोह मे
इच्छा शक्ति के तले
असीम आस
क्या करे क्या ना करे
नन्ही सी आत्मा
भटकाता रहता
मन बावला
प्रपंच फंसकर
जग ढूंढता
सुख चैन का निंद
जगजाहिर
मन आत्मा की बैर
घुन सा पीसे
पंच तत्व की काया
जग की यह मा...
गांव के पुरवासी
बेटवा सुन
गांव देखा है कभी
दादी पूछते
नही दादी नही तो
किताब पढ़
जाना है मैं गांव को
भारत देश
किसानों का देश है
कृषि प्रधान
गांवो में बसते हैं
किसान लोग
मवेशियों के साथ
खेती करते
हां बेटा हां
गांव किसानों का है
थोड़ा जुदा है
तेरे किताबों से रे
अपना गांव
गांव की शरारत
अल्हड़ प्यार
लोगों के नाते रिश्ते
खुली बयार
खुला खुला आसमा
खुली धरती
तलाब के...
सोचें जरा (तांका)
1. शरम हया
लड़की का श्रृंगार
लड़को का क्या
लोक मर्यादा नोचे
इसको कौन सोचे ।
2. नर नारी का
समता वाजिब है
रसोई घर
चैका करे पुरूष
दफ्तर नारी साजे ।
3. ...
करना है आराम (चोका)
ढलती शाम
दिन का अवसान
देती विराम
भागम भाग भरी
दिनचर्या को
आमंत्रण दे रही
चिरशांति को
निःशब्द अव्यक्त
बाहें फैलाय
आंचल में ढक्कने
निंद में लोग
होकर मदहोश
देखे सपने
दिन के घटनाएं
चलचित्र सा
पल पल बदले
रोते हॅसते
कुछ भले व बुरे
वांछित अवांछित
आधे अधूरे
नयनों के सपने
हुई सुबह
फिर भागम भाग
अंधड़ दौड़
जीवन का अस्तित्व
आखीर क्या है
मृत्यु के शैय्या पर
सोच...
एक सौ एक हाइकू
1. हे गजानन
कलम के देवता
रखना लाज ।
2. ज्ञान दायनी
हर लीजिये तम
अज्ञान मेट ।
3. आजादी पर्व
धर्म धर्म का पर्व
देश का गर्व.
4. पाले सपना...
सत्यमेव जयते (छप्पय छंद)
सत्य नाम साहेब, शिष्य कबीर के कहते ।
राम नाम है सत्य, अंत पल तो हम जपते ।।
करें सत्य की खोज, आत्म चिंतन आप करें ।
अन्वेषण से प्राप्त, सत्य को ही आप वरें ।।
शाश्वत है सत्य नष्वर जग, सत्य प्रलय में षेश है ।
सत्यमेव जयते सृश्टि में, शंका ना लवलेष है ।।
असत्य बन कर मेघ, सत्य रवि ढकना चाहे ।
कुछ पल को भर दंभ, नाच ले वह मनचाहे ।।
मिलकर राहू केतु,...
सावन (गीतिका छंद)

हर हर महादेव ..................... माह सावन है लुभावन, वास भोलेनाथ का । आरती पूजा करे हम, व्रत भी भोलेनाथ का ।। लोग पार्थिव देव पूजे, नित्य नव नव रूप से । कामना सब पूर्ण करते, ले उबारे कूप से ।। -रमेशकुमार सिंह चौह...
सावन
ये रिमझिम सावन, अति मन भावन, करते पावन, रज कण को ।
हर मन को हरती, अपनी धरती, प्रमुदित करती, जन जन को ।
है कलकल करती, नदियां बहती, झर झर झरते, अब झरने ।
सब ताल तलैया, डूबे भैया, लोग लगे हैं, अब डरने ।।
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-रमेशकुमार सिंह चौह...
दोहे -रूपया ईश्वर है नही
काम काम दिन रात है, पैसे की दरकार ।
और और की चाह में, हुये सोच बीमार ।।
रूपया ईश्वर है नही, पर सब टेके माथ ।
जीवन समझे धन्य हम, इनको पाकर साथ ।।
मंदिर मस्जिद देव से, करते हम फरियाद ।
अल्ला मेरे जेब भर, पसरा भौतिक वाद ।।
निर्धनता अभिशाप है, निश्चित समझे आप ।
कोष बड़ा संतोष है, मत कर तू संताप ।।
धरे हाथ पर हाथ तू, सपना मत तो देख ।
करो जगत में काम...
मेरे नगर नवागढ़ में बाढ़ का एक दृश्य

गीतिका छंद
.............................................
मेघ बरसे आज ऐसे , मुक्त उन्मुक्त सा लगे ।
देख कर चहु ओर जल को, देखने सब जा जुटे ।। नीर बहते तोड़ तट को, अब लगे पथ भी नदी । गांव घर तक आ गया जल, है मची कुछ खलबली ।।
हाट औ बाजार में भी, धार पानी की चली ।
पार...
दोहे
लाभ हानि के प्रश्न तज, माने गुरु की बात ।
गुरु गुरुता गंभीर है, उलझन झंझावात ।।
सीख सनातन धर्म का, मातु पिता भगवान ।
जग की चिंता छोड़ तू, कर उनका सम्मान ।।
पढ़े लिखे हो घोर तुम, जो अक्रांता सुझाय ।
निज माटी के सीख को, तुम तो दिये भुलाय ।।
अपनी सारी रीतियां, कुरीति होती आज ।
परम्परा की बात से, तुमको आती लाज ।।
इतने ज्ञानी भये तुम, पूर्वज...
रहना तुम सचेत (रोला छंद)
मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।
मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।
रहना तुम सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।
हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।
मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।
खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।
इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।
बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्मनी का लगाये ।। रहना तुम सचेत ....
यह तो भारत देश्ा, लगे...
सर्कस
खेल सर्कस का दिखाये, ले हथेली प्राण को । डोर पथ पर चल सके हैं, संतुलित कर ध्यान जो ।। एक पहिये का तमाशा, जो दिखाता आज है । साधना साधे सफलतम, पूर्ण करता काज है ।। काम जोखिम से भरा यह, पेट खातिर वह करे । अंर्तमन दुख को छुपा कर,हर्ष सबके मन भरे ।। लोग सब ताली बजाते, देख उनके दांव को । आवरण देखे सभी तो, देख पाये ना घाव को ।। ये जगत भी एक सर्कस, लोग...
पहेली बूझ
पहेली बूझ !
जगपालक कौन ?
क्यो तू मौन ।
नही सुझता कुछ ?
भूखे हो तुम ??
नही भाई नही तो
बता क्या खाये ?
तुम कहां से पाये ??
लगा अंदाज
क्या बाजार से लाये ?
जरा विचार
कैसे चले व्यापार ?
बाजार पेड़??
कौन देता अनाज ?
लगा अंदाज
हां भाई पेड़ पौधे ।
क्या जवाब है !
खुद उगते पेड़ ?
वे अन्न देते ??
पेड़ उगे भी तो हैं ?
उगे भी पेड़ !
क्या पेट भरते हैं ?
पेट पालक...
हम आजाद है हम आजाद है
पक्षीय गगन चहके गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
नदीयां बहती करती कलकल
हम आजाद है हम आजाद है
तरू शाखा लहराये और गाये
हम आजाद है हम आजाद है
मृग उछलते नाचते गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
मयूर पसारे पंख नाचे गाये
हम आजाद है हम आजाद है
तन प्रफूल्लित मन प्रफूल्लित
हम आजाद है हम आजाद है
मन सोचे प्रकति अनुकूल
तन झूमे प्रकृति अनुकूल
प्रकृति अनुशासन में रहके...
अब जमाना लग रहे रूपहले
अब जमाना लग रहे रूपहले
याद आ रहा है मुझे एक बात,
मेरे दादाजी ने जो कहे एक रात ।
धरती पर स्वर्ग लगते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।
भुले बिसरे से लगते अब हमारे संस्कार,
परम्पराओं पर भारी पड़ रहे अब नवाचार ।
परम्पराओं पर जान छिड़कते थे लोग पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।
मेरे माता पिता ने सिखये जो रीति,
तेरे पापा उसे ही तो कह रहे कुरीति...
गुरू
जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू,
अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू ।
कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू,
निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू ।
न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू,
चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू ।
सारे अपराधो से सना तन मन है मेरा गुरू,
अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू ।
दयावंत आप हे कृपालु...
अपनी कलम की नोक से
अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।
भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।
डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।
निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नई सबेरा है ।
राही कोई और हो न सही,
अपने आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है...
एक गौरेया की पुकार
एक गौरैया एक मनुज से कहती है ये बोल,
हे बुद्विमान प्राणी हमारे जीवन का क्या है मोल ।
अपने हर प्रगति को अब तो जरा लो तोल,
सृष्टि के कण-कण में दिया है तूने विष घोल ।
क्या हम नही कर सकते कल कल्लोल,
क्यो हो रही हमारी नित्य क्रिया कपोल ।
इस सृष्टि में क्या हम नही सकते हिल-डोल,
हे मनुज अब तो अपना मनुष्यता का पिटारा खोल ।
जो तेरा है वो मेरा भी...
बरखा रानी
मानसून ढूंढे पथ अपना । कृषक बुने जीवन का सपना पलक पावड़े बिछाय पथ पर । सभी निहारे अपलक नभ पर बरखा रानी क्यो रूठी है । धरती अब तक तो सूखी है आशाढ़ मास बितने को है । कृषक नैन अब रिसने को है आने को है अब तो सावन । यह जो अब मत लगे डरावन हे बरखा अब झलक दिखाओ । हमें और ना अधिक सताओ उमड़ घुमड़ के अब तो आओ । धरती के तुम प्यास बुझाओ छप्प छप्प खेलेंगे...
महंगाई
बढ़े महंगाई, करे कमाई, जो जमाखोर, मनमानी ।
सरकारी ढर्रा, जाने जर्रा, है सांठ गांठ, अभिमानी ।।
अब कौन हमारे, लोग पुकारे, जो करे रक्षा, हम सब की ।
सीखें अर्थशास्त्र, भुल पाकशास्त्र, या करें भजन, अब रब की ।।
-रमेशकुमार सिंह चौह...
पीपल का पेड़ (गीतिका छंद)
पेड़ पीपल का खड़ा है, एक मेरे गांव में ।
शांति पाते लोग सारे , बैठ जिसके छांव में ।।
शाख उन्नत माथ जिसका, पर्ण चंचल शान है ।
हर्ष दुख में साथ रहते, गांव का अभिमान है ।।
पर्ण जिसके गीत गाते, नाचती है डालियां ।
कोपले धानीय जिसके, है बजाती तालियां ।।
मंद शीतल वायु देते, दे रहे औषध कई ।
पूज्य दादा सम हमारे, सीख देते जो नई।
नीर डाले मूल उनके, भक्त आस्थावान...
तांका (लघु कविता)
तांका लघु कविता
1.
तितली रानी
सुवासित सुमन
पुष्प दीवानी
आलोकित चमन
नाचती नचाती है ।
2.
पुष्प की डाली
रंग बिरंगे फूल
हर्षित आली
मदहोश हृदय
कोमल पंखुडि़यां ।
3.
जुगनू देख
लहर लहरायें
चमके तारे
निज उर प्रकाश
डगर बगराये ।
4.
कैसी आशिक
जल मरे पतंगा
जीवन लक्ष्य
मिलना प्रियतम
एक तरफा प्यार ।
5.
चिंतन करो
चिंता...
गजल
तेरे होने का मतलब चूडियाॅं समझती हैं
आंख में चमक क्यों हैं पुतलियाॅं समझती है
ये बदन का इठलाना और मन का मिचलाना
गूंथे हुये गजरों की बालियाॅं समझती है
हो तुम्ही तो मेरे श्रृंगार की वजह सारे
इस वजूदगी को हर इंद्रियाॅं समझती है
श्वास तेरे मेरे जो एक हो गये उस पल
एहसास को तो ये झपकियाॅं समझती है
साथ देना तुम पूरे उम्र भर वफादारी से
बेवफाई...
जरा मुस्कुराकर
नेताजी से एक बार, पूछ लिया एक पत्रकार । हे महानुभाव तुम्हारे जीतने के क्या हैं राज ? जनता जर्नादन है मैं उनका पुजारी नेताजी कहे सीर झुका कर । जलाभिशेक करता कई बोतल लाल पानी चढ़ाकर । भांति भांति के भेट मैं अपने देव चढ़ाता अपनी मनोकामना उनसे कह कह कर । हरे हरे फूल पत्र दानपेटी डालता उनके डेहरी पर अपना सीर झुका कर। पत्रकार से नेताजी कहे जरा मुस्कुराकर...
गजल- यारब जुदा ये तुझ से जमाना तो है नही
यारब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नही
क्यों फिर भी कहते तेरा ठिकाना तो है नही
कण कण वजूद है तो तुम्हारा सभी कहे
माने भी ऐसा कोई सयाना तो है नही
सुख में भुला पुकारे तुझे दुख मे आदमी
नायाब उनका कोई बहाना तो है नही
भटके रहे जो माया के पीछे यहीं कहीं
कोई भला खुदा का दिवाना तो है नही
लगता मुझे तो खुद का इबादत ही ढोंग सा
अपना भी...
मतपेटी तो बोलेगी , आज मेरे देश में
झूठ और फरेब से, सजाये दुकानदारी ।
व्यपारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
वादों के वो डाले दाने, जाल कैसे बिछायें है ।
शिकारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
जात पात धरम के, दांव सभी लगायें हैं ।
जुवारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
तल्ख जुबान उनके, काट रही समाज को ।
कटारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
दामन वो फैलाकर, घर घर तो घूम रहे...
कहमुकरिया
1.निकट नही पर दूर कहां है ?
उनके नयन सारा जहां है ।
पलक झपकते करते कमाल
क्या सखि साजन ?
न अंतरजाल ।।
2.मित्र न कोई उनसे बढ़कर ।
प्रेम भाव रखे हृदय तल पर ।।
सीधे दिल पर देते दस्तक ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि पुस्तक ।।
3.हाथ धर उसे अधर लगाती ।
हलक उतारी प्यास बुझाती ।।
मिलन सार की अमर कहानी ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि पानी ।।
4.रोम रोम वो रमते...
मदिरापान
मदिरापान कैसा है, इस देश समाज में ।
अमरबेल सा मानो, फैला जो हर साख में ।।
पीने के सौ बहाने हैं, खुशी व गम साथ में ।
जड़ है नाश का दारू, रखे है तथ्य ताक में ।।
कुत्ता वह गली का हो, किसी को देख भौकता ।
उनके पास होते जो, उन्ही को देख नोचता ।।
इंसान था भला कैसे, पागल वह हो गया ।
लाभ हानि तजे कैसे, दारू में वह खो गया ।।
किया जो पान दैत्यों सा, मृत्यु...
शिखरिणी छंद
जिसे भाता ना हो, छल कपट देखो जगत में ।
वही धोखा देते, खुद फिर रहे हैं फकत में ।।
कभी तो आयेगा, तल पर परिंदा गगन से ।
उड़े चाहे ऊॅचे, मन भर वही तो मगन से ...
गीतिका छंद
प्रेम का मै हू पुजारी, प्रेम मेरा आन है ।
प्रेम का भूखा खुदा भी, प्रेम ही भगवान है ।।
वासना से तो परे यह, शुद्ध पावन गंग है ।
जीव में जीवन भरे यह, प्रेम ही तो प्राण है ।।
पुत्र करते प्रेम मां से, औ पिता पु़त्री सदा ।
नींव नातो का यही फिर, प्रेम क्यो अनुदान है ।।
बालपन से है मिले जो, प्रेम तो लाचार है ।
है युवा की क्रांति देखो, प्रेम आलीशान है ।।
गोद...
होली पर कहमुकरियां
मोहित हुई देख कर सूरत ।
लगे हैं काम की वह मूरत ।।
मधुवन के कहते उसे कंत ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि बसंत ।।1।।
होली पर ही घर को आते ।
बच्चे पाकर उधम मचाते ।।
करते कोलाहल चितकारी ।
क्या सखि साजन ?
ना पिचकारी ।।2।।
सुंदर दिखे वह गोल मटोल ।
मुस्काय लेत खुशियां टटोल ।।
मेरे पर्वो की वह तो धुरी ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि ना पुरी ।।3।।
प्रतिक्षा में...
होली गीत (छन्न पकैया छंद)
छन्न पकैया छन्न पकैया, मना रहें सब होरी ।
अति प्यारी सबको लागे है, राधा कृष्णा जोरी ।।1।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, कहे श्याम रास किये ।
ब्रज नार राधा संग नाचे, अति पावन प्रेम लिये ।।2।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, क्यो कुछ रिति है खोटी ।
मदिरा भंग से तंग करते, पहचान लगे मोटी ।।3।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, कीचड़ मुख मलते वह ।
गाली भी क्यों...
हिन्दी (छप्पय छंद)
हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, हमारी हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
निज भाषा के साथ, खिले अब माथे बिन्दी ।।
भाषा बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ...
नवगीत-मंदिर मस्जिद द्वार
1.
मंदिर मस्जिद द्वार
बैठे कितने लोग
लिये कटोरा हाथ
शूल चुभाते अपने बदन
घाव दिखाते आते जाते
पैदा करते एक सिहरन
दया धर्म के दुहाई देते
देव प्रतिमा पूर्व दर्शन
मन के यक्ष प्रश्न
मिटे ना मन लोभ
कौन देते साथ
कितनी मजबूरी कितना यथार्थ
जरूरी कितना यह परिताप
है यह मानव सहयातार्थ
मिटे कैसे यह संताप
द्वार पहुॅचे निज हितार्थ
मांग तो वो भी...
कह मुकरियां
1.
श्याम, रंग मुझे हैं लुभाये ।
रखू नैन मे उसे छुपाये ।
नयनन पर छाये जस बादल ।
क्या सखि साजन ? ना सखि काजल ।
2.
मेरे सिर पर हाथ पसारे
प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।
कभी करे ना वह तो पंगा ।
क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा
3.
उनके वादे सारे झूठे ।
बोल बोलते कितने मीठे ।
इसी बल पर बनते विजेता ।
क्या सखि साजन ? ना सखि नेता...
गजल-जब से दौलत हमारा निशाना हुआ
जब से दौलत हमारा निशाना हुआ
तब से ये जिंदगी कैद खाना हुआ ।
पैसे के नाते रिश्ते दिखे जब यहां
अश्क में इश्क का डूब जाना हुआ ।
दुख के ना सुख के साथी यहां कोई है
मात्र दौलत से ही जो यराना हुआ ।
स्वार्थ में कुछ भी कर सकते है आदमी
उनका अंदाज अब कातिलाना हुआ ।
गैरो का ऊॅचा कद देखा जब आदमी
छाती में सांप का लोट जाना हुआ ।
रेत सा तप रहा बर्फ सा जम...
सरस्वती वंदना (गीतिका)
हे भवानी आदि माता, व्याप्त जग में तू सदा ।
श्वेत वर्णो से सुशोभित, शांत चित सब से जुदा ।।
हस्त वीणा शुभ्र माला, ज्ञान पुस्तक धारणी ।
ब्रह्म वेत्ता बुद्धि युक्ता, शारदे पद्मासनी ।।
हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें...
दोहावली -
दोहावली -
रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय ।
चरित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।। जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान । बन जाओ कुम्हार तुम, कुंभ गढ़ो तब शान ।। लिखना पढना क्यो करे, समझो तुम सब बात । देश धर्म का मान हो, गांव परिवार साथ ।। पुत्र सदा लाठी बने, कहते हैं मां बाप । उनकी इच्छा पूर्ण कर, जो हो उनके आप ।। -रमेशकुमार सिंह...
एक श्रमीक नारी (रोला छंद)
बैठी गिट्टी ढेर, एक श्रम थकीत नारी ।
माथे पर श्रम श्वेद, लस्त कुछ है बेचारी ।।
पानी बोतल हाथ, शांत करती वह तृष्णा ।
रापा टसला पास, जपे वह कृष्णा कृष्णा ।।
पी लेती हूॅ नीर, काम है बाकी करना ।
काम काम रे काम, रोज है जीना मरना ।।
मजदूरी से मान, कहो ना तुम लाचारी ।
मिलकर सारे बोझ, ढोय ना लगते भारी ।।
सवाल पापी पेट, कौन ले जिम्मेदारी ।
एक अकेले आप,...
मेरा अपना गांव (रोला छंद)
मेरा अपना गांव, विश्व से न्यारा न्यारा । प्रेम मगन सब लोग, लगे हैं प्यारा प्यारा ।। काका बाबा होय, गांव के बुजुर्ग सारे । हर सुख दुख में साथ, सखा बन काम सवारे ।। अमराई के छांव, गांव के छोरा छोरी । खेले नाना खेल, करे सब जोरा जोरी ।। ग्वाला छेड़े वेणु, धेनु धुन सुन रंभाती । मुख पर लेकर घास, उठा शिश स्नेह दिखाती ।। मोहे पनघट नाद, सखी मिल करे ठिठोली...
दोहावली
अपने समाज देश के, करो व्याधि पहचान । रोग वाहक आप सभी, चिकित्सक भी महान ।। रिश्वत देना कोय ना, चाहे काम ना होय । बने घाव ये समाज के, इलाज करना जोय ।। भ्रष्टाचार बने यहां, कलंक अपने माथ । कलंक धोना आपको, देना मत तुम साथ ।। रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय । च्रित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।। जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान...
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मानवता हो पंगु जब, करे कौन आचार । नैतिकता हो सुप्त जब, जागे भ्रष्टाचार ।। प्रथा कमीशन घूस हैे, छूट करे सरकार । नैतिकता के पाठ का,...
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जिसे भाता ना हो, छल कपट देखो जगत में । वही धोखा देते, खुद फिर रहे हैं फकत में ।। कभी तो आयेगा, तल पर परिंदा गगन से । उड़े चाहे ऊॅचे, मन...
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चरण पखारे शिष्य के, शाला में गुरू आज । शिष्य बने भगवान जब, गुरूजन के क्या काज ।। गुरूजन के क्या काज, स्कूल में भोजन पकते । पढ़ना-लिखना छ...
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गणेश वंदना दोहा - जो गणपति पूजन करे, ले श्रद्धा विश्वास । सकल आस पूरन करे, भक्तों के गणराज ।। चौपाई हे गौरा गौरी के लाला । हे ल...
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योग दिवस के राह से, खुला विश्व का द्वार । भारत गुरू था विश्व का, अब पुनः ले सम्हार ।। गौरव की यह बात है, गर्व करे हर कोय । अपने ही इस...
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लोकतंत्र के राज में, जनता ही भगवान । पाॅंच साल तक मौन रह, देते जो फरमान । द्वार द्वार नेता फिरे, जोड़े दोनो हाथ । दास कहे खुद को सदा, म...
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25.10.16 एक मंत्र है तंत्र का, खटमल बनकर चूस। झोली बोरी छोड़कर, बोरा भरकर ठूस ।। दंग हुआ यह देख कर, रंगे उनके हाथ । मूक बधिर बन आप ही, ...
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प्रेम का मै हू पुजारी, प्रेम मेरा आन है । प्रेम का भूखा खुदा भी, प्रेम ही भगवान है ।। वासना से तो परे यह, शुद्ध पावन गंग है । जीव में जी...
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चीं-चीं चिड़िया चहकती, मुर्गा देता बाँग । शीतल पवन सुगंध बन, महकाती सर्वांग ।। पुष्पकली पुष्पित हुई, निज पँखुडियाँ प्रसार । उद...
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मदिरापान कैसा है, इस देश समाज में । अमरबेल सा मानो, फैला जो हर साख में ।। पीने के सौ बहाने हैं, खुशी व गम साथ में । जड़ है नाश का दार...
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