बुधवार, 17 जून 2015

भ्रष्टाचार पर दोहे

मानवता हो पंगु जब, करे कौन आचार ।
नैतिकता हो सुप्त जब, जागे भ्रष्टाचार ।।

प्रथा कमीशन घूस हैे, छूट करे सरकार ।
नैतिकता के पाठ का, है ज्यादा दरकार ।।

जनता नेता भ्रष्ट है, भ्रष्ट लगे सब तंत्र ।
नेत्रहीन कानून है, दिखे कहां षडयंत्र ।।

अपने समाज देष का, करो व्याधि पहचान ।
जनक व्याधि के आप ही, आपहि वैद्य महान ।।

रिश्वत देना रोग है, रिश्वत लेना रोग ।
जीना दुष्कर जो करे, बनकर पामर योग ।।

चूसे भ्रष्टाचार अब, खटमल जैसे खून ।
देष राज्य बेहाल है, छोड़ो आप जुनून ।।

हल्ला भ्रष्टाचार का, करते हैं सब कोय ।
जो बदलें निज आचरण, हल्ला काहे होय ।।

घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग ।
रक्तबीज के रक्त ये, देते रहते रोग ।।





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