मंगलवार, 11 जुलाई 2017

एक-एक की छाती फाड़ों, बचे न अत्याचारी

रोना-धोना छोड़ करें अब, बदले की तैयारी ।
एक-एक की छाती फाड़ों, बचे न अत्याचारी ।

अमरनाथ के भक्तों को जो, घात लगा कर मारे ।
आजादी या जेहादी के, जो लगा रहे नारे ।।

कश्मीर हमारे पुरखों का, नही बाप के उनके ।
धर्म नही है कोई कमतर, हमको समझे तिनके ।।

छुप-छुप कर जो आतंकी बन, करते हैं बमबारी ।
एक-एक की छाती फाड़ों, बचे न अत्याचारी ।।

सरहद के रखवालों को, जो छुप-छुप कर मारे ।
जिनके हाथों पर हैं पत्थर, आतंकी हैं सारे ।।

राष्ट्र धर्म ही धर्म बड़ा है, जो बात न यह माने ।
ऐसे दुष्टों को तो केवल, शत्रु राष्ट्र का जाने ।।

ऐसे बैरीयों से लड़ने, तोड़ो हर लाचारी ।
एक-एक की छाती फाड़ों, बचे न अत्याचारी ।

जो बैरी हो बाहर का या, विभिषण होवे घर का ।
जो भगवा चोला धारे या, ओढ़ रखें हो बुरका ।।

छद्म धर्म निरपेक्षी बनकर, जो करते नौटंकी ।
खोज निकालो ऐसे बैरी, जो पाले आतंकी ।।

बहुत सहे आतंकी सदमा, अब है उनकी बारी
एक-एक की छाती फाड़ों, बचे न अत्याचारी ।


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