शनिवार, 17 जून 2017

प्रतिक दिखे ना हिन्द का

स्वतंत्रता के नाम पर, किया गया षड़यंत्र ।
प्रतिक दिखे ना हिन्द का, रचा गया वह तंत्र ।।

मुगलों का प्राचीर है,, अंग्रेजों का मंत्र ।
रखा गया ना एक भी, हिन्दुस्तानी तंत्र ।।

जगत एक परिवार है, केवल कहता हिन्द ।
एक खेल है चल रहा, बचे न इसके बिन्द ।।

कहते छाती ठोक जो, हम ही किये विकास ।
रंग किये जर्जर भवन,, करके नींव विनाश ।।

हम ही अपने शत्रु हैं, दूजे तो है मित्र ।
कल की गलती जान कर, सीखें कोई सीख ।।
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