बुधवार, 14 जून 2017

वर्षो से परतंत्र हैं

वर्षो से परतंत्र है, भारतीय परिवेश  ।
मुगलों  ने कुचला कभी, देकर भारी क्लेश ।।
देकर भारी क्लेश, कभी आंग्लों ने लूटा ।
देश हुआ आजाद,  दमन फिर भी ना छूटा  ।।
संस्कृति अरु संस्कार, सुप्त है अपकर्षो से ।
वैचारिक  परतंत्र, पड़े हैं हम वर्षो से ।।
-रमेश चौहान
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