मंगलवार, 27 जून 2017

मेघा बरसो झूम के

काँव-काँव कागा करे, ची.-चीं चहके चिड़िया,
मल्हार छेड़े झिंगुरा, मेघा बरसो झूम के ।
होले-होले पेड़ नाचे, पर पसारे मोरनी,
बेसुध हो मन नाचे, मेघा बरसो झूम के ।।
धरा की धानी आँचल, नदियों की खिली बाँहे
लिख रहीं नवगीत, मेघा बरसो झूम के ।
रज सौंधी सुवासित, जब तन-मन छाये
कली बलखाती गाती, मेघा बरसो झूम के ।।

शनिवार, 17 जून 2017

प्रतिक दिखे ना हिन्द का

स्वतंत्रता के नाम पर, किया गया षड़यंत्र ।
प्रतिक दिखे ना हिन्द का, रचा गया वह तंत्र ।।

मुगलों का प्राचीर है,, अंग्रेजों का मंत्र ।
रखा गया ना एक भी, हिन्दुस्तानी तंत्र ।।

जगत एक परिवार है, केवल कहता हिन्द ।
एक खेल है चल रहा, बचे न इसके बिन्द ।।

कहते छाती ठोक जो, हम ही किये विकास ।
रंग किये जर्जर भवन,, करके नींव विनाश ।।

हम ही अपने शत्रु हैं, दूजे तो है मित्र ।
कल की गलती जान कर, सीखें कोई सीख ।।

गुरुवार, 15 जून 2017

कठिनाई सर्वत्र है

कठिनाई सर्वत्र है,  चलें किसी भी राह ।
बंधन सारे तोड़िये, मन में भरकर चाह ।।
मन में भरकर चाह, बढ़े मंजिल को पाने ।
नही कठिन वह लक्ष्य, इसे निश्चित ही जाने ।।
सुनलो कहे रमेश, हौसला है चिकनाई ।
फौलादी संकल्प, तोड़ लेते कठिनाई ।।

बुधवार, 14 जून 2017

वर्षो से परतंत्र हैं

वर्षो से परतंत्र है, भारतीय परिवेश  ।
मुगलों  ने कुचला कभी, देकर भारी क्लेश ।।
देकर भारी क्लेश, कभी आंग्लों ने लूटा ।
देश हुआ आजाद,  दमन फिर भी ना छूटा  ।।
संस्कृति अरु संस्कार, सुप्त है अपकर्षो से ।
वैचारिक  परतंत्र, पड़े हैं हम वर्षो से ।।
-रमेश चौहान

सोमवार, 12 जून 2017

अपनी रेखा गढ़ लें

हर रेखा बड़ी होती, हर रेखा होती छोटी,
सापेक्षिक निति यह, समझो जी बात को ।
दूसरों को छेड़े बिन, अपनी रेखा गढ़ लें
उद्यम के स्वेद ले, तोड़ काली रात को।।
खीर में शक्कर चाही, शाक में तो नमक रे
सबका अपना कर्द, अपना ही मोल है ।
दूर के ढोल सुहाने, लगते हों जिसको वो
जाकर जी देखो भला, ढोल मे भी पोल है ।।