शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

कुछ समझ नही पाता

मैं गदहा घोंचू हॅूं
कुछ समझ नही पाता

मैं भारत को आजाद समझता
वे आजादी के लगाते नारे
जिसे मैं बुद्धजीवी कहता
उनसे वे निभाते भाईचारे

अपने वतन को जो गाली देता
राष्ट्र भक्त बन जाता

मैं धरती का सेवक ठहरा
वे कालेज के बच्चे
मेरी सोच सीधी-सादी
वो तो ज्ञानी सच्चे

माँ-बाप को घाव देने वाला
श्रवण कुमार कहलाता

मैं कश्मीर का निष्कासित पंड़ित
वे कश्मीर के करिंदे
मेरे आँसू झर-झर झरते
पोंछ सके न परिंदे

जो आता पास मेरे
सम्प्रदायिक हो जाता

मैं लोकतंत्र बिछा चौसर
वे शकुनी के फेके पासे
दिल्ली की गद्दी युधिष्ठिर
फस  गये उसके झांसे

धृतराष्ट्र का राजमोह
दुर्योधन को ही भाता

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