रविवार, 26 फ़रवरी 2017

प्रश्न उठता है तब से

तब से लेकर आज तक, दिखे एक ही हाल ।
मुद्दा यह कश्मीर का, फँसा हूआ किस चाल ।।
फँसा हूआ किस चाल, चीन अक्साई बनकर ।
घेर रखे कश्मीर, पाक तब से अब तनकर ।।
बांट रहें है देश, मिले आजादी जब से ।
भारत के हैं कौन, प्रश्न उठता है तब से ।

उपेक्षित रहे न बेटा

बेटा बेटी एक है, इसमें नहीं सवाल ।
पढ़ी लिखीं हर बेटियां, करती नित्य कमाल ।।
करती नित्य कमाल, खुशी देती हैं सबको ।
बेटा क्यों कमजोर, लगे अब दिखने हमको ।।
चिंता करे ‘रमेश‘, बढ़े ना क्यों दुलहेटा ।
जरा दीजिये ध्यान, उपेक्षित रहे न बेटा ।।
(दुलहेटा-दुलारा बेटा)

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

कुछ समझ नही पाता

मैं गदहा घोंचू हॅूं
कुछ समझ नही पाता

मैं भारत को आजाद समझता
वे आजादी के लगाते नारे
जिसे मैं बुद्धजीवी कहता
उनसे वे निभाते भाईचारे

अपने वतन को जो गाली देता
राष्ट्र भक्त बन जाता

मैं धरती का सेवक ठहरा
वे कालेज के बच्चे
मेरी सोच सीधी-सादी
वो तो ज्ञानी सच्चे

माँ-बाप को घाव देने वाला
श्रवण कुमार कहलाता

मैं कश्मीर का निष्कासित पंड़ित
वे कश्मीर के करिंदे
मेरे आँसू झर-झर झरते
पोंछ सके न परिंदे

जो आता पास मेरे
सम्प्रदायिक हो जाता

मैं लोकतंत्र बिछा चौसर
वे शकुनी के फेके पासे
दिल्ली की गद्दी युधिष्ठिर
फस  गये उसके झांसे

धृतराष्ट्र का राजमोह
दुर्योधन को ही भाता

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

एक राष्ट्र हो किस विधि

एक-दूजे के पूरक होकर
यथावत रखें संसार
पक्ष-विपक्ष राजनीति में
जनता के प्रतिनिधि
प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा
एक राष्ट्र हो किस विधि
अपने पूँछ को शीश कहते
दिखाते क्यों चमत्कार
हरे रंग का तोता रहता
जिसका लाल रंग का चोंच
एक कहता बात सत्य है
दूजा लेता खरोच
सत्य को ओढ़ाते कफन
संसद के पहरेदार
सागर से भी चौड़े हो गये
सत्ता के गोताखोर
चारदीवारी के पहरेदार ही
निकले कुंदन चोर
राजनीति के वायरस से
सिस्टम हुआ बीमार
सिक्के के दो पहलू होते
वाहन के दो पहिये
दो-दो के हैं जोड़ जगत में
इन्हें शत्रु मत कहिये
समर्थक-विरोधी, बाल-वृद्ध
खास-आम, नर-नार

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

काम मांगे मतदाता

मतदाता को मान कर, पत्थर सा भगवान ।
नेता नेता भक्त बन, चढ़ा रहे पकवान ।।
चढ़ा रहे पकवान, एक दूजे से बढ़कर ।
रखे मनौती लाख, घोषणा चिठ्ठी गढ़कर ।।
बिना काम का दाम, मुफ्तखोरी कहलाता ।
सुन लो कहे ‘रमेश‘, काम मांगे मतदाता ।।

देना है तो दीजिये, हर हाथों को काम ।
नही चाहिये भीख में, कौड़ी का भी दाम ।।
कौड़ी का भी दाम, नहीं मिल पाते हमको ।
अजगर बनकर तंत्र, निगल जाते हैं सबको ।।
सुन लो कहे ‘रमेश‘, दिये क्यों हमें चबेना ।
हमें चाहिये काम, दीजिये जो हो देना ।।