गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

दंभ भरे है तंत्र

खड़े रहे हम पंक्ति, देखने नोट गुलाबी ।
वह अपने घर बैठ, दिखाते रहे खराबी ।।
पाले स्वप्न नवीन, पीर झेले अधनंगे ।
कोशिश किये हजार, कराने वह तो दंगे ।
जिसने घोला है जहर, रग में भ्रष्टाचार का ।
दंभ भरे है तंत्र वह, अपने हर व्यवहार का ।।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

/त्रिष्टुप छंद//

(111 212 212 11)
विरह पीर से गोपियां व्रज
डगर जोहती श्यामनी तट
नयन ढूंढती श्याम का पथ
अधर श्याम है श्याम है घट
-रमेश चौहान

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

गीत


सेठों को

देखा नही,

हमने किसी कतार में

 

फुदक-फुदक कर यहां-वहां जब

चिड़िया तिनका जोड़े

बाज झपट्टा मार-मार कर

उनकी आशा तोड़े

 

जीवन जीना है कठिन,

दुनिया के दुस्वार में

 

जहां आम जन चप्पल घिसते

दफ्तर-दफ्तर मारे ।

काम एक भी सधा नही है

रूके हुयें हैं सारे

 

कौन कहे कुछ बात है,

दफ्तर उनके द्वार में

पंक्ति एक जीवन है

पंक्ति एक जीवन है
साथी पंक्ति एक जीवन है ।
निर्धन यहाँ पंक्ति का कैदी, धरती का ठीवन है ।।
दो जून पेट का ही भरना, दीनों का तीवन है ।
आजीविका ढूंढते यौवन, शिक्षा का सीवन है ।।
यक्ष प्रश्न आज पूछथे क्यों, धन बिन क्या जीवन है ।
आँख मूंद कर बैठे रहना, राजा का खीवन है ।।
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(ठीवन-थूक, तीवन-पकवान, सीवन-सिलाई, खीवन-मतवालापन)
पंक्ति एक जीवन है