मंगलवार, 8 नवंबर 2016

भारत के राजधानी में

हवा में, पानी में
भारत के
राजधानी में

घूम रहा है ‘करयुग‘ का कर्म
श्यामल-श्यामल रूप धर कर
यमराज के साथ चित्रगुप्त
स्याह खाते को बाँह भर कर

बचपने में, बुढ़ापे में
कर रहा हिसाब
भरी जवानी में

जग का कण-कण बंधा है
अपने कर्मो के डोर से
सूर्य अस्त होता नही
राहू-केतू के शोर से

भरे हाट में, सुने बाट में
छोड़ देता है
पद चिन्ह हर जुबानी में

पाप की रेखा लंबी चौड़ी
यह छोटी होगी कब
पुण्य की मोटी-तगड़ी रेखा
हाथो से खिचोगे जब

पुण्यमयी वायु
शुद्ध शीतल पुरवाही
बहेगी तब रवानी में

एक टिप्पणी भेजें