शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

घुला हुआ है वायु में, मीठा-सा विष गंध (नवगीत,)

घुला हुआ है
वायु में,
मीठा-सा  विष गंध

जहां रात-दिन धू-धू जलते,
राजनीति के चूल्हे
बाराती को ढूंढ रहे  हैं,
घूम-घूम कर दूल्हे

बाँह पसारे
स्वार्थ के
करने को अनुबंध

भेड़-बकरे करते जिनके,
माथ झुका कर पहुँनाई
बोटी -  बोटी करने वह तो
सुना रहा शहनाई

मिथ्या- मिथ्या
प्रेम से
बांध रखे इक बंध

हिम सम उनके सारे वादे
हाथ रखे सब पानी
चेरी,  चेरी ही रह जाती
गढ़कर राजा -रानी

हाथ जले हैं
होम से
फँसे हुये हम धंध।

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