बुधवार, 4 नवंबर 2015

राजनीति के खेल में

राजनीति के खेल में, गूंजे एक सवाल ।
नैतिकता रख ताक पर, क्यों कर रहे बवाल ।।

बोटी बोटी नोच ले, बैठे शव पर बाज ।
जीवित मानव मांस को, मानव खाये आज ।।

कौन पखारे है चरण, कौन बने भगवान ।
तारक सम नेता करे, भोले जन का ध्यान ।।

राजनीति के खेल को, देखें आंखें खोल ।
शकुनि देत संकेत जब, पासा बोले बोल ।

कौरव दल के शोर में, भीष्म पितामह मौन ।
खड़ी धर्म की द्रोपदी, लाज बचावें कौन ।।

सहिष्णुता है क्या बला, पूछे ऐसे लोग ।
जग जिसका परिवार है, करे धर्म का योग ।।

अचरज की क्या बात है, नेता मारे लात ।
पद वा पैसा पाय के, कौन नही बलखात ।।

नेता से हम है नही, हम से नेता होय ।
काट रहे हैं पेड़ हम, जैसे बीजा बोय ।।

नेता नभ से आय ना, धरती का वह अंश ।
हमसे गुण अरू दोश ले, देते हमको दंश ।।

फेंके जो सम्मान को, क्या है उसका मान ।
गढने अपने देश को, किये कभी मतदान ।

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