सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

जग जननी मां आइये ..

जग जननी मां आइये, मेरी कुटिया आज ।
मुझ निर्धन की टेर सुन, रखिये मेरी लाज ।।

निर्धन से तो है भला, कचरा तिनका घास ।
दीनता के अभिशाप से, दुखी आपका दास ।।
मानव सा माने नहीं, जग का सभ्य समाज ।। जग जननी मां आइये ...

बेटी बहना है दुखी, देख जगत व्यभिचार ।
लोक लाज अब मिट रहे, नवाचार की मार ।।
लोग यहां घर छोड़ के, दिखला रहे मिजाज । जग जननी मां आइये....

घर-घर दिखते दैत्य अब, कैसे बताऊं बात ।
भाई भाई से लड़े, मां को मारे लात ।
मातु-पिता लाचार सब, बेटा बहू निलाज । जग जननी मां आइये...

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