मंगलवार, 1 सितंबर 2015

कुछ दोहे

कल की बातें छोड़ दे, बीत गया सो बीत ।
बीते दिन बहुरे नहीं, यही जगत की रीत ।।

चले चलो निज राह तू, करना नही विश्राम ।
तेरी मंजिल दूर है, रखो काम से काम ।।

जीत हार में एक ही, अंतर होते सार ।
मंजिल पाना सार है, बाकी सब बेकार ।।

जान बूझ कर लोग क्यूं, चल पड़ते उस राह ।
तन मन करते खाक जो, करके उसकी चाह ।।

 जग में भागम भाग है, भागें हैं हर कोय ।
कोई ढ़ूंढ़े प्यार हैं, शांति शोहरत कोय ।।

रीत प्रीत की है सहज, मत कर तू अभिमान ।
अपनों के संबंध में, तोड़ दे स्वाभिमान ।।

संस्कृत भाषा रम्य है, माने सकल जहाॅन ।
संस्कृत भाषा बोल कर, गढ़ लो अपनी शान ।।

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