शनिवार, 8 अगस्त 2015

शर्मसार है धर्म

अपना दामन छोड़ कर, देखे सकल जहान ।
दर्शक होते लोग ये, बनते नही महान ।।

उपदेशक सब लोग है, सुने कौन उपदेश ।
मुखशोभा उपदेश है, चाहे कहे ‘रमेश‘ ।।

परिभाषा है धर्म का, धारण करने योग्य ।
मन वाणी अरू कर्म से, सदा रहे जो भोग्य ।।

धरे धर्म के मर्म को, मानस पटल समेट ।
प्राणी प्राणी एक सा, सबके दुख तू मेट ।।

 भेड़ बने वे लोग क्यों, चले एक ही राह ।
आस्था के मंड़ी बिके, लिये मुक्ति की चाह ।।

तार-तार आस्था हुई, शर्मसार है धर्म ।
बाबा गुरू के नाम से, आज किये दुष्कर्म ।।

छोड़ दिये निज मूल को, साखा बैठे जाय ।
साखा होकर फिर वही, खुद को मूल बताय ।।

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