बुधवार, 17 जून 2015

घोर-घोर रानी (चौपाई छंद)

काली-काली बरखा आई । हरी-हरी हरियाली लाई
रिमझिम-रिमझिम  बरसे पानी । नम पुरवाही चले सुहानी

बितत बिते पतझड़ दुखदायी । पुष्‍प-पत्र पल्लव हर्षाई
वन उपवन अब लगे मुस्काने । खग-मृग मानव गाये गाने

इंद्रधनुश नभ पर बन आये । देख-देख बच्चे हर्षाये
रंग बै जा नी ह पी ना ला । बच्चे पढ़े थे पाठशाला

तडि़त जब लाल आॅंख दिखाये । बादल भी नगाड़ा बजाये
रण-भेरी को सब सुन-सुन कर । बैठ रहे हैं आॅंख मूंद कर

छप छप करते खेले बच्चे । जल बहाव में खाते गच्चे
गा कर इतना इतना पानी । खेल रहे घोर-घोर रानी

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