गुरुवार, 7 मई 2015

मन का दर्पण आॅंख है (दोहे)

आंख बहुत वाचाल है, बोले नाना भाव ।
सुख-दुख गुस्सा प्रेम को, रखती अपने ठांव ।।

नयनों में वात्सल्य है, देख नयन न अघाय ।
इक दूजे को देख कर, नयनन नयन समाय ।।

उलझन आंखों में लिये, करती कैसे बात ।
मुख रहती खामोश पर, नयन देत सौगात ।।

आंख तरेरे आंख जब, नयन नीर छलकाय ।
प्रेम अश्रु जल धार में, नयनन ही बह जाय ।।

मन का दर्पण आॅंख है, देती बिम्ब उकेर।
झूठ कभी ना बोलती, चाहे लो मुॅंह फेर ।।

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