सोमवार, 27 अप्रैल 2015

अटल नियम है सृष्टि की

अटल नियम है सृष्टि की, देखें आंखे खोल ।
प्राणी प्राणी एक है, आदमी पिटे ढोल ।।

इंसानी संबंध में, अब आ रही दरार ।
साखा अपने मूल से, करते जो तकरार ।।

खग-मृग पक्षी पेड़ के, होते अपने वंश ।
तोड़ रहे परिवार को, इंशा देते दंश ।।

कई जाति अरू वर्ण के, फूल खिले है बाग ।
मिलकर सब पैदा करे, इक नवीन अनुराग ।।

वजूद बगिया के बचे, हो यदि नाना फूल ।
सब अपने में खास है, सबको सभी कबूल ।।

पत्ते छोड़े पेड़ जो, हो जाते हैं खाक ।
उग आतें है ठूठ में, नवीन पर्ण सजात ।।

आम बौराय आम में, नीम बौराय नीम ।
आम नीम के मेल का, दिखे न कोई थीम ।।

आम नीम तो भिन्न है, नाम पेड़ है एक ।
पृथ्क-पृथ्क होते हुये, शत्रुता नही देख ।।
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