गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

अंतरमन में रखूं समेटे.

अंतरमन में रखूं समेटे, हम सब की जो है यारी ।
छुटपन की हम सखी सहेली, इक दूजे को प्यारी ।।

साथ-साथ हम पढ़े-लिखें हैं, खेले कूदे साझा ।
किये शरारत इक दूजे से, स्मरण हुई अब ताजा ।।
शिशु से किशोरी भई हम तो, गई समय मनुहारी ।
पढ़ाई स्कूल की पूर्ण हुई, बिछुड़न की अब बारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

‘रश्मि‘ बड़ी भोली-भाली तू, बात सभी सह जाती ।
ध्यान सभी की रखती आई, प्यार सदा जतलाती ।।
लड़ती-झगड़ती  शरारत में, मस्ती करती प्यारी ।
यदा-कदा जब वह रूठ जाती, हमसब  कहतीं स्वारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

‘मधु‘ तो गुस्सा नाक बिठाये, सुन शरारती बातें ।
चाहे वह रूठे हजार हम पर, भुक्कड़ बोल चिढ़ाते ।।
भूख छोड़ सब बातें सहती, सहन शक्ति अति भारी ।
शांत सहज दिखती वह हर पल, अति प्रिय सखी हमारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

‘प्रिया‘ बहुत सीधी-सादी तू, आॅंसू सबकी पोछे ।
भला सदा तू सबकी करती, बुरा कभी ना सोचे ।।
कभी नही तू रोती पल भर, चाहे दुख हो भारी ।
प्रिया तुझे सभी सखीयों में,जिज्ञासा अति प्यारी।। अंतरमन में रखूं समेटे....

‘जिज्ञासा‘ अति भावुक कन्या, सबका कहना माने ।
सबको करती स्नेह बराबर, निकट प्रिया को जाने ।।
छोटी-छोटी बातो पर वह, कहती हरदम स्वारी ।
हम सब की अति प्यारी तू तो, ‘वत्सला‘ तुझे प्यारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

वातसल्य भरी ‘वत्सला‘ में, बहुत खुशीया बांटे ।
मुस्कान चेहरों पर लाकर, गहन क्लेश को काटे ।।
अपने दुख पर परदा डालें, खुश रहती मतवारी ।
शालीनता भरे रग-रग में, बातें करती प्यारी । अंतरमन में रखूं समेटे....

‘दिव्या‘ रखती ध्यान सभी का, अच्छा खाना लाती ।
जब कोई दो बातें करतीं, सदा बीच में आती ।।
हरदम वह रश्मि संग करती, मस्ती प्यारी-प्यारी ।
साथ सभी के घुलमिल रहती, प्रिय सहेली हमारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

अभी-अभी तो साथ हमारे, आई नई सहेली ।
कैसे घुलमिल हमसे गई, लगती एक पहेली ।।
मस्ती में वह करती मस्ती, कभी शरारत न्यारी ।
पढ़ने-लिखने में चंगा जो, वह ‘धनेश्वरी‘ प्यारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....

सुखमय चौदह बरस गुजारे, हम सभी संगवारी ।
स्वर्णिम पल आंखों में भरकर, गा रहे गीत प्यारी ।। अंतरमन में रखूं समेटे....
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