बुधवार, 18 मार्च 2015

जीवन (दोहे)

ढ़ूंढ रहा मैं गांव को, जाकर अपने गांव ।
छोड़ गया था जिस तरह, दिखा नही वह ठांव ।।

ढल जाये जब शाम तो, हॅंसती आती रात ।
लाती है फिर चांदनी, एक मधुर सौगात ।।

एकाकीपन साथ ले, यादो की बारात ।
स्वपन सुंदरी बांह में, कट जाती है रात ।।

मृत्यु पूर्व मैं चाहता, अदा करूॅं सब कर्ज ।
रे जीवन तू भी बता, तेरा क्या है मर्ज ।।

पाप-पुण्य की जिंदगी, भटके जीव विहंग ।
सुख-दुख बोझिल पंख है, गहे कौन सा रंग ।।

छोड़ो जग में दुश्मनी, मिलेगा ना कुछ शेष ।
कर लो यारी आप अब, मिट जायेंगे क्लेश ।।

उलझन में मन है फसा, क्या होगा भगवान ।
अपनी गलती मानकर, बन गया पहलवान ।।

भरा हुआ गुण दोश है, हर मानव के देह ।
दोष दिखे कुछ ना उसे, गुण सेे रखते  नेह ।।

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