शुक्रवार, 6 मार्च 2015

झूमत नाचत फागुन आये मत्तगयंद (मालती) सवैया


मौर लगे अमुवा सरसो पर,
मादकता महुॅआ छलकाये ।
पागल हो भवरा भटके जब
फूल सुवासित बागन छाये ।।
रंग बिरंग उड़े तितली तब
गंध सुगंध धरा बगराये ।
कोयल है कुहके जब बागन
झूमत नाचत फागुन आये ।।

लाल गुलाल पलाश खिले जब,
राज बसंत धरा पर छाये ।
धूप व शीत़ सुहावन हो तब 
मंद सुगंध बयार सुहाये ।
पाकर नूतन पल्लव डंठल
पेड़ जवा बन के ललचाये ।।
झूम उठी तितली जब फूलन
झूमत नाचत फागुन आये ।।
नाचत गावत फाग मनोहर
लेत बुलावत मोहन राधे ।।
हाथ गुलाल लिये मलते मुख
मान बुरा मत बोलय साधे
हाथ लिये पिचका सब बालक
झुण्ड बना कर खेलन आये ।
रंग गुलाल उड़े जब बादल
झूमत नाचत फागुन आये ।।
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मौलिक अप्रकाशित
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