शनिवार, 31 जनवरी 2015

सुसुप्त वह स्वाभिमान (अतुकांत)

अतुकांत

हाथ में कटोरा हो ना हो,
भीख मांग रहे सभी,
कोई मंदिर मस्जिद द्वारे बैठ
कोई घर-घर दे दस्तक
कोई स्टेशन में हाथ फैलाय
कोई सरकार से छाती ठोक
मुफ्त बिजली पानी
मुफ्त राशन
मांगे खुद को गरीब कह कह
धनवान भी मांग रहे
छूट छूट
आयकर से छूट
इस कर से छूट, उस कर से छूट
मेहनती किसान भी
मांग रहे
सब्सीड़ी में खाद
सब्सीड़ी में कृषि औजार
गांव-गांव
गरीबी रेखा के नीचे
जीवन यापन करने वालो
 की भरमार ।
दानी है वर दानी है
केवल नेता
बांट रहे
वादे वादे वादे
मुफ्तखोर इंसान बनाने
रग-रग में मुफ्तखोरी जगाने
मुफ्त में दारू
मुफ्त में कपड़ा
मुफ्त में ........
मुफ्त में ........
मुफ्त में ........
कौन कहें
भीख नही अधिकार चाहिये
चाहिये हर हाथों में काम
कौन जगाये हमसब में
सुसुप्त वह स्वाभिमान ।।

-रमेश चौहान
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