गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

बंधन

मृत्युलोक माया मोह अमर । मोह पास ही जग लगे समर
लोग कहे यह मेरा अपना । संत कहे जगत एक सपना

जीते जो जग में यह माया । मिट्टी समझे अपनी काया
स्वार्थ के सब रिश्ते नाते । स्नेही जीवन अनमोल बनाते

आसक्ति प्रीत में भेद करें । कमल पत्र सा निर्लिप्त रहे
है अनमोल प्रीत का बंधन । रहे सुवासित जैसे चंदन
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