मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

भारतीय रेल

रेल के रेलम पेल में, जल्दबाजी के खेल में, छत पर चढ़ रहे, देखो नर नारीयां ।
जान जोखिम में डाल, गोद में बच्चे सम्हाल, दिखा रहें हैं वीरता, दक्ष सवारीयां ।।
अबला सबला भई, दुर्गावती लक्ष्मी बन, लांघ रही वह बोगी, छत में ठौर पाने ।
कौन इन्हें समझायें, जीवन मोल बतायें, क्यों करते नादानी, रेल के दीवाने ।।

रेल-रेल भारतीय रेल, रेल है ऐसा जिसके़, अंदर को कौन कहे, छत भी गुलजार है ।
बेटिकट बेखटका, रेलवे को दे झटका, कह रहे छाती ठोक, रेलवे बीमार है ।।
भारतीय रेल पर, टिकटों के खेल पर, दलाल मालामाल है, जनता लाचार है ।
फस्ट सेकण्ड स्वीपर, ए.सी. के अनुपात में, लगें हैं जनरल का, और दरकार है ।।

यहां-वहां जहां-तहां, देख सको जहां जहां, देखो तुम वहां वहां, समस्या ही खड़ा है ।
हर कोई जानता है, नही कोई मानता है, समस्या पैदा करने, आदमी ही अड़ा है ।।
समस्या को बुनते है, समस्या से जुझते है, समस्या में रहते हैं, लोग बन समस्या ।
उलझन को जो हेरे, उलझन का दास है, दास को सुलझाना, खुद एक समस्या ।।
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