शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

सोचें जरा (तांका)

1.     शरम हया
    लड़की का श्रृंगार
    लड़को का क्या
    लोक मर्यादा नोचे
    इसको कौन  सोचे ।

2.    नर नारी का
    समता वाजिब है
    रसोई घर
    चैका करे पुरूष
    दफ्तर नारी साजे ।

3.    सोचें हैं कभी
    रूपहले पर्दे में
    नग्नतावाद
    कैसे पसारे पांव
    मूक दर्शक आप ।

4.    कम कपड़े
    कोई क्यो पहनते
    हवा खाना हो
    नंगे होकर बैठें
    पागल के समान ।

5.    खुली चुनौती
    वासना को देते
    खुले बदन
    बजा रहें हैं ढोल
    मर्यादा साधे मौन ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान
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