रविवार, 27 जुलाई 2014

गुरू

जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू,
अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू ।

कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू,
निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू ।

न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू,
चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू ।

सारे अपराधो से सना तन मन  है मेरा गुरू,
अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू ।

दयावंत आप हे कृपालु भी आप है गुरू,
दया की नजर से मुझे एक बार निहारो गुरू ।
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