गुरुवार, 31 जुलाई 2014

रहना तुम सचेत (रोला छंद)

मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।
मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।
रहना तुम सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।
हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।

मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।
खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।
इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।
बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्‍मनी का लगाये ।। रहना तुम सचेत ....

यह तो भारत देश्‍ा, लगे उपवन फूलों का ।
माली न बने चोर,कष्‍ट दे जो श्‍ाूलों का ।।
रखना हमको ध्यान, बांट वो हमें न पावे ।
वो तो अपने स्वार्थ, आज तो आग लगावे ।। रहना तुम सचेत ....

तू जो करे अजान, करूं मै ईश्‍वर पूजा ।
ईश्‍वर अल्ला नाम, नही हो सकते दूजा ।।
करते हम सम्मान, एक दूजे को भाये ।
हमें मिले जो श्‍ाांति, और जन जान न पाये ।। रहना तुम सचेत ....


हाड़ मांस का देह, रक्त में भी है लाली ।
हिन्दू मुस्लिम पूर्व, रहे हम मानव खुश्‍ाहाली ।।
दिये हमारे बाप, सीख जो उसे निभायें ।
अब कौमी के गीत, साथ मिलकर हम गायें । रहना तुम सचेत ....

बुधवार, 30 जुलाई 2014

सर्कस


खेल सर्कस का दिखाये, ले हथेली प्राण को ।
डोर पथ पर चल सके हैं, संतुलित कर ध्यान जो ।।
एक पहिये का तमाशा, जो दिखाता आज है ।
साधना साधे सफलतम, पूर्ण करता काज है ।।

काम जोखिम से भरा यह, पेट खातिर वह करे ।
अंर्तमन दुख को छुपा कर,हर्ष सबके मन भरे ।।
लोग सब ताली बजाते, देख उनके दांव को ।
आवरण देखे सभी तो, देख पाये ना घाव को ।।

ये जगत भी एक सर्कस, लोग करतबबाज हैं ।
जूझते जो उलझनो से, सृष्टि के सरताज हैं ।।
ध्येय पथ पर बढ़ चलो तुम, डोर जैसे नट चले।
दुख जगत का एक पहिया, तुम चलो इसके तले ।।
-रमेशकुमार सिंह चैहान

रविवार, 27 जुलाई 2014

पहेली बूझ

1.  पहेली बूझ !
जगपालक कौन ?
क्यो तू मौन ।
नही सुझता कुछ ?
भूखे हो तुम ??
नही भाई नही तो
बता क्या खाये ?
तुम कहां से पाये ??
लगा अंदाज
क्या बाजार से लाये ?
जरा विचार
कैसे चले व्यापार ?
बाजार पेड़??
कौन देता अनाज ?
लगा अंदाज
हां भाई पेड़ पौधे ।
क्या जवाब है !
खुद उगते पेड़ ?
वे अन्न देते ??
पेड़ उगे भी तो हैं ?
उगे भी पेड़ !
क्या पेट भरते हैं ?
पेट पालक ??
सीधे सीधे नही तो
फिर सोच तू
कैसे होते पोशण
कोई उगाता
पेड़ पौधे दे अन्न
कौन उगाता ?
किसका प्राण कर्म ?
समझा मर्म
वह जग का शान
वह तो है किसान ।
2.घने जंगल
वह भटक गया
साथी न कोई
आगे बढ़ता रहा
ढ़ूंढ़ते पथ
छटपटाता रहा
सूझा न राह
वह लगाया टेर
देव हे देव
सहाय करो मेरी
दिव्य प्रकाष
प्रकाशित जंगल
प्रकटा देव
किया वह वंदन
मानव है तू ?
देव करे सवाल
उत्तर तो दो
मानवता कहां है ?
महानतम
मैने बनाया तुझे
सृष्टि रक्षक
मत बन भक्षक
प्राणी जगत
सभी रचना मेरी
सिरमौर तू
मुखिया मुख जैसा
पोशण कर सदा ।
3.कौन है सुखी ?
इस जगत बीच
कौन श्रेष्ठ है ?
करे विचार
किसे पल्वित करे
सापेक्षवाद
परिणाम साधक
वह सुखी हैं
संतोष के सापेक्ष
वह दुखी है
आकांक्षा के सापेक्ष
अभाव पर
उसका महत्व है
भूखा इंसान
भोजन ढूंढता है
पेट भरा है
वह स्वाद ढूंढता
कैद में पक्षी
मन से उड़ता है
कैसा आश्चर्य
ऐसे है मानव भी
स्वतंत्र तन
मन परतंत्र है
कहते सभी
बंधनों से स्वतंत्र
हम आजाद है रे ।
4.रोपा है पौध
रक्त सिंचित कर
निर्लिप्त भाव
जीवन की उर्वरा
अर्पण कर
लाल ओ मेरे लाल
जीवन पथ
सुघ्घड़ संवारते
चुनते कांटे
हाथ आ गई झुर्री
लाठी बन तू
हाथ कांप रहा है
अंतःकरण,
प्रस्पंदित आकांक्षा,
अमूर्त पड़ा
मूर्त करना अब,
सारे सपने,
अनगढ़े लालसा
प्रतिबम्ब है
तू तन मन मेरा
जीवन समर्पण ।
5.चारू चरण
चारण बनकर
श्रृंगार रस
छेड़ती पद चाप
नुुपूर बोल
वह लाजवंती है
संदेश देती
पैर की लाली
पथ चिन्ह गढ़ती
उन्मुक्त ध्वनि
कमरबंध बोले
लचके होले
होले सुघ्घड़ चाल
रति लजावे
चुड़ी कंगन हाथ,
हथेली लाली
मेहंदी मुखरित
स्वर्ण माणिक
ग्रीवा करे चुम्बन
धड़की छाती
झुमती बाला कान
उभरी लट
मांगमोती ललाट
भौहे मध्य टिकली
झपकती पलके
नथुली नाक
हंसी उभरे गाल
ओष्ठ गुलाबी
चंचल चितवन
गोरा बदन
श्वेत निर्मल मन
मेरे अंतस
छेड़ती है रागनी
प्राण सम सजनी ।।
6.कौन करे है ?
देश में भ्रष्टाचार,
हमारे नेता,
नेताओं के चम्मच
आम जनता
शासक अधिकारी
सभी कहते
हाय तौबा धिक्कार
थूक रहे हैं
एक दूसरे पर
ये जानते ना कोई
नही नही रे
मानते नही कोई
तुम ही तो हो
मै भी उनके साथ
बेकार की है बात ।

7.सभ्यसमाज
एक कुशल माली
बेटी की पौध
रोपते जतन से
पल्लवित होकर
नन्ही सी पौध
अटखेलियां करे
गुनगुनाती हुई
पुष्पित होती
महके चारो ओर
करे जतन
तोड़े ना कोई चोर
जग बगिया
बेटी जिसकी शोभा
गढ़े गौरव गाथा ।
8.तारें आकश
दीनकर प्रकाश
धरती रज
समुद्र जल निधि
ईश्वर दया
माप सका है कौन
जगत मौन
ममता का आंचल
गोद में शिशु
रक्त दान करती
वात्सल्य स्नेह वह

हम आजाद है हम आजाद है

पक्षीय गगन चहके गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
नदीयां बहती करती कलकल
हम आजाद है हम आजाद है
तरू शाखा लहराये और गाये
हम आजाद है हम आजाद है
मृग उछलते नाचते गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
मयूर पसारे पंख नाचे गाये
हम आजाद है हम आजाद है
तन प्रफूल्लित मन प्रफूल्लित
हम आजाद है हम आजाद है
मन सोचे प्रकति अनुकूल
तन झूमे प्रकृति अनुकूल
प्रकृति अनुशासन में रहके बोले
हम आजाद है हम आजाद है ।।

अब जमाना लग रहे रूपहले

अब जमाना लग रहे रूपहले 
याद आ रहा है मुझे  एक बात,
मेरे दादाजी ने जो कहे एक रात ।
धरती पर स्वर्ग लगते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

भुले बिसरे से लगते अब हमारे संस्कार,
परम्पराओं पर भारी पड़ रहे अब नवाचार ।
परम्पराओं पर जान छिड़कते थे लोग पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

मेरे माता पिता ने सिखये जो रीति,
तेरे पापा उसे ही तो कह रहे कुरीति ।
हर रीति में नीति होते थे पहले
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

कहते अब ‘हम दो हमारे दो‘ प्यारे,
हमें क्या रहने दो और रिष्ते सारे ।
एक छप्पर तले जीते थे हम पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

अब मान कहां धरम ईमान का,
अब कीमत कहां जुबान का ।
अब कहां छोटे बड़े का मान है,
सभी के सम्मान होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।


मर्यादाओं का सीमा टूट रहे,
युवक युवती मजे लूट रहे ।
अब चेहरा श्वेत होवे न श्याम
मुंह काले हो जाते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

दाम्पत्य जीवन टूट रहे,
नर नारी में आक्रोश फूट रहे ।
पति पत्नि का सम्मान आ गया बाजार,
जो घर के अंदर कैद होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

परिवार के आधार टूट रहे,
परम्पराओं के दामन छूट रहे ।
संस्कार पथ छोड़े हो रहे ये हाल,
‘सादा जीवन उच्च विचार‘ से जीते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

गुरू

जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू,
अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू ।

कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू,
निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू ।

न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू,
चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू ।

सारे अपराधो से सना तन मन  है मेरा गुरू,
अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू ।

दयावंत आप हे कृपालु भी आप है गुरू,
दया की नजर से मुझे एक बार निहारो गुरू ।

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।

भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।

डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।

निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नई सबेरा है ।

राही कोई और हो न सही,
अपने आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है ।

एक गौरेया की पुकार

एक गौरैया एक मनुज से कहती है ये बोल,
हे बुद्विमान प्राणी हमारे जीवन का क्या है मोल ।

अपने हर प्रगति को अब तो जरा लो तोल,
सृष्टि के कण-कण में दिया है तूने विष घोल ।

क्या हम नही कर सकते कल कल्लोल,
क्यो हो रही  हमारी नित्य क्रिया कपोल ।

इस सृष्टि में क्या हम नही सकते हिल-डोल,
हे मनुज अब तो अपना मनुष्यता का पिटारा खोल ।

जो तेरा है वो मेरा भी है सारा सृष्टि-खगोल,
फिर क्यो बिगाड़ते रहे हो हमारा भूगोल ।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

बरखा रानी


मानसून ढूंढे पथ अपना । कृषक बुने जीवन का सपना
पलक पावड़े बिछाय पथ पर । सभी निहारे अपलक नभ पर

बरखा रानी क्यो रूठी है । धरती अब तक तो सूखी है
आशाढ़ मास बितने को है । कृषक नैन अब रिसने को है

आने को है अब तो सावन । यह जो अब मत लगे डरावन
हे बरखा अब झलक दिखाओ । हमें और ना अधिक सताओ

उमड़ घुमड़ के अब तो आओ । धरती के तुम प्यास बुझाओ
छप्प छप्प खेलेंगे बच्चे । बहते जल पर उछल उछल के
-रमेशकुमार सिंह चौहान