शनिवार, 24 मई 2014

गजल


तेरे होने का मतलब चूडियाॅं समझती हैं
आंख में चमक क्यों हैं पुतलियाॅं समझती है

ये बदन का इठलाना और मन का मिचलाना
गूंथे हुये गजरों की बालियाॅं समझती है

हो तुम्ही तो मेरे श्रृंगार की वजह सारे
इस वजूदगी को हर इंद्रियाॅं  समझती है

श्वास तेरे मेरे जो एक हो गये उस पल
एहसास को तो ये झपकियाॅं समझती है

साथ देना तुम पूरे उम्र भर वफादारी से
बेवफाई को कातिल  सिसकियाॅं  समझती है
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-रमेश कुमार चाैहान

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