रविवार, 20 अप्रैल 2014

मदिरापान



मदिरापान कैसा है, इस देश समाज में ।
अमरबेल सा मानो, फैला जो हर साख में ।।

पीने के सौ बहाने हैं, खुशी व गम साथ में ।
जड़ है नाश का दारू, रखे है तथ्य ताक में ।।

कुत्ता वह गली का हो, किसी को देख भौकता ।
उनके पास होते जो, उन्ही को देख नोचता ।।

इंसान था भला कैसे, पागल वह हो गया ।
लाभ हानि तजे कैसे, दारू में वह खो गया ।।

किया जो पान दैत्यों सा, मृत्यु को ही पुकारता ।
करे दुश्कर्म जो सारे, वंश को ही उखाड़ता ।।
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-रमेशकुमार सिंह चैहान
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