रविवार, 16 मार्च 2014

होली पर कहमुकरियां



मोहित हुई देख कर सूरत ।
लगे हैं काम की वह मूरत ।।
मधुवन के कहते उसे कंत ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि बसंत ।।1।।

होली पर ही घर को आते ।
बच्चे  पाकर उधम मचाते ।।
करते कोलाहल चितकारी ।
क्या सखि साजन ?
ना पिचकारी ।।2।।

सुंदर दिखे वह गोल मटोल ।
मुस्काय लेत खुशियां टटोल ।।
मेरे पर्वो की वह तो धुरी ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि ना पुरी ।।3।।

प्रतिक्षा में मै नैन बिछाये ।
बारह माह बाद वह आये ।।
धरे रंग रंग के पोटली ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि होली ।।4।।

कहते सभी उसे चित चोर ।
ऊधम करते वह गली खोर ।।
बुझा रहे वह मन की तृष्णा ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि कृष्णा
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