गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

गजल-जब से दौलत हमारा निशाना हुआ

जब से दौलत हमारा निशाना हुआ
तब से ये जिंदगी कैद खाना हुआ ।

पैसे के नाते रिश्‍ते दिखे जब यहां
अश्‍क में इश्‍क का डूब जाना हुआ ।

दुख के ना सुख के साथी यहां कोई है
मात्र दौलत से ही जो यराना हुआ ।

स्वार्थ में कुछ भी कर सकते है आदमी
उनका अंदाज अब कातिलाना हुआ ।

गैरो का ऊॅचा कद देखा जब आदमी
छाती में सांप का लोट जाना हुआ ।

रेत सा तप रहा बर्फ सा जम रहा
जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ।

जो खुदा सा इबादत करे पैसो का
या खुदा आपका मुस्कुराना हुआ ।

हाथ फैलाये आना औ जाना है
अब दो गज का ही तो आशियाना हुआ ।

सरस्वती वंदना (गीतिका)

हे भवानी आदि माता, व्याप्त जग में तू सदा ।
श्‍वेत वर्णो से सुशोभित, शांत चित सब से जुदा ।।
हस्त वीणा शुभ्र माला, ज्ञान पुस्तक धारणी ।
ब्रह्म वेत्ता बुद्धि युक्ता, शारदे पद्मासनी ।।

हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्‍व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें ।।

शारदे हे ज्ञान दात्री, मां शरण में लीजिये ।
हम अज्ञानों से भरे है, ज्ञान उर भर दीजिये ।।
धर्म मानवता धरे हम, नष्‍ट दोषो को करें ।
सत्य पथ पर चल सके हम, शक्ति इतना मन भरें ।

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

दोहावली -

दोहावली -

अपने समाज देश के, करो व्याधि पहचान ।
रोग वाहक आप सभी, चिकित्सक भी महान ।।

‍रिश्‍वत देना कोय ना, चाहे काम ना होय ।
बने घाव ये समाज के, इलाज करना जोय ।।

भ्रष्‍टाचार बने यहां, कलंक अपने माथ ।
कलंक धोना आपको, देना मत तुम साथ ।।

हल्ला भ्रष्‍टाचार का, करते हैं सब कोय ।
जो बदलें निज आचरण, हल्ला काहे होय ।।

घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग ।
रक्तबीज के रक्त ये, मिटे कहां मन लोभ ।।

रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय ।
चरित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।।

जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान ।
बन जाओ कुम्हार तुम, कुंभ गढ़ो तब शान ।।

लिखना पढना क्यो करे, समझो तुम सब बात ।
देश धर्म का मान हो, गांव परिवार साथ ।।

पुत्र सदा लाठी बने, कहते हैं मां बाप ।
उनकी इच्छा पूर्ण कर, जो हो उनके आप ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान