मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

जीवन (चोका)

1.
ढलती शाम
दिन का अवसान
देती विराम
भागम भाग भरी
दिनचर्या को
आमंत्रण दे रही
चिरशांति को
निःशब्द अव्यक्त
बाहें फैलाय
आंचल में ढक्कने
निंद में लोग
होकर मदहोश
देखे सपने
दिन के घटनाएं
चलचित्र सा
पल पल बदले
रोते हॅसते
कुछ भले व बुरे
वांछित अवांछित
आधे अधूरे
नयनों के सपने
हुई सुबह
फिर भागम भाग
अंधड़ दौड़
जीवन का अस्तित्व
आखीर क्या है
मृत्यु के शैय्या पर
सोच रहा मानव
गुजर गया
जीवन एक दिन
आ गई शाम
करना है आराम
शरीर छोड़ कर ।

2.
आत्मा अमर
शरीर छोड़कर
घट अंदर
तड़पती रहती
ऊहा पोह मे
इच्छा शक्ति के तले
असीम आस
क्या करे क्या ना करे
नन्ही सी आत्मा
भटकाता रहता
मन बावला
प्रपंच फंसकर
जग ढूंढता
सुख चैन का निंद
जगजाहिर
मन आत्मा की बैर
घुन सा पीसे
पंच तत्व की काया
जग की यह माया ।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

प्रीत के दोहे

मेहंदी तेरे नाम की, रचा रखी है हाथ ।
जीना मरना है मुझे, अब तो तेरे साथ ।।

रूठी हुई थी भाग्य जो, मोल लिया जब शूल ।
तेरे कारण जगत को, मैंने समझी धूल ।।

तेरी मीठी बात से, हृदय गई मैं हार ।
तेरी निश्चल प्रीत पर, तन मन जाऊॅ वार ।।

देखा जब से मैं तुझे, सुध बुध गई विसार ।
मीरा बन मैं श्याम पर, सब कुछ किया निसार ।।

खोले सारे भेद को, मेरे दोनों नैन ।
नही नुपुर भी मौन है, बोले मीठी बैन ।।

रविवार, 21 दिसंबर 2014

लोकतंत्र का कमाल देखो (सार छंद)

 लोकतंत्र का कमाल देखो, हमसे मांगे नेता ।
झूठे सच्चे करते वादे, बनकर वह अभिनेता ।।

लोकतंत्र का कमाल देखो, रंक द्वार नृप आये ।
पाॅंच साल के भूले बिसरे, फिर हमको भरमाये ।।

लोकतंत्र का कमाल देखो, नेता बैठे उखडू ।
बर्तन वाली के आगे वह, बने हुये है कुकडू ।।

लोकतंत्र का कमाल देखो, एक मोल हम सबका ।
ऊॅंच नीच देखे ना कोई, है समान हर तबका ।।

लोकतंत्र का कमाल देखो, शासन है अब अपना ।
अपनों के लिये बुने अपने, अपनेपन का सपना ।।


े.

चुनावी दोहे

लोकतंत्र के राज में, जनता ही भगवान ।
पाॅंच साल तक मौन रह, देते जो फरमान ।

द्वार द्वार नेता फिरे, जोड़े दोनो हाथ ।
दास कहे खुद को सदा, मांगे सबका साथ ।।

एक नार थी कर रही, बर्तन को जब साफ ।
आकर नेता ने कहा, करो मुझे तुम माफ ।

काम पूर्ण कर ना सका, जो थी मेरी बात ।
पद गुमान के फेर में, भूल गया औकात ।।

निश्चित ही इस बार मैं, कर दूंगा सब काज ।
समझ मुझे अब आ गया, तुमसे मेरा ताज ।।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

एक मुठ्ठी की भांति (तांका)

1.
क्यों भूले तुम ?
अपनी मातृभाषा
माॅं का आॅंचल
कभी खोटा होता है ?
खोटी तेरी किस्मत ।

2.
दूर के ढोल
मधुर लगे बोल
नभ में सूर्य
धरातल से छोटा
बहुत सुहाना है ।

3.
आतंकवाद
धार्मिक कट्टरता
नही सीखाता
बाइबिल कुरान
हिन्द का गीता पुराण ।

4.
स्वीकार करें
दूसरो का सम्मान
क्यों थोपते हो ?
पंथ धर्म विचार
सभी खुद नेक हैं ।

5.
गरज रहा
आई.एस.आई.ई
सचेत रहे
हिन्दू मुस्लिम एक
एक मुठ्ठी की भांति ।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

छोड़ो झगड़ा नाम का

छोड़ो झगड़ा नाम का, ईश्वर अल्ला एक ।
खुदा की खुदाई भली, प्रभु की प्रभुता नेक ।।

धर्म धरे विश्वास से, सभी धर्म है नेक ।
कट्टरता के शूल से, मानव पथ ना छेक ।।

मानवता के राह चल, आप मनुष्य  महान ।
दीन हीन को साथ ले, गढ़ लें रम्य जहान ।।

दीन हीन सब तृप्त हो, सुख मय हो दिन रैन ।
भेद भाव अब खत्म हो, मिले सभी को चैन ।।

अपनी सेवा आप कर, निज रूप को पहचान ।
कहते फिरते क्यो भला, कण कण में भगवान ।।



गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

बंधन

मृत्युलोक माया मोह अमर । मोह पास ही जग लगे समर
लोग कहे यह मेरा अपना । संत कहे जगत एक सपना

जीते जो जग में यह माया । मिट्टी समझे अपनी काया
स्वार्थ के सब रिश्ते नाते । स्नेही जीवन अनमोल बनाते

आसक्ति प्रीत में भेद करें । कमल पत्र सा निर्लिप्त रहे
है अनमोल प्रीत का बंधन । रहे सुवासित जैसे चंदन

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

कब समझेगा मर्म रे

हिन्दू मुस्लिम राग, छोड़ दे रे अब बंदे ।
कट्टरता को छोड़, छोड़ सब गोरख धंधे ।।
धर्म पंथ का काज, करे पावन तन मन को ।
पावन पवित्र स्नेह, जोड़ती है जन जन को ।।
राग द्वेष को त्याग कर अब, कर ले सब से प्रेम रे ।
मानव मानव सब एक है, कब समझेगा मर्म रे ।।

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

द्वारिका पुरी सुहानी रे भैया

द्वारिका पुरी सुहानी रे भैया
नही कोई इसका सानी है ।
बांके बिहारी तो यहां है रहते-2
जहां उसकी राजधानी है ।।

सागर श्याम को जगह है दीन्हो
विश्वकर्मा ने यह रचना है कीन्हो
कान्हा अपना वास जहां है लीन्हो
वसे है जहां उसके पटरानी रे भैया
नही कोई इसका सानी है ।

ऊंचे ऊंचे जहां महल अटारी
रथ घोड़े का अद्भूत सवारी
देखे भौचक्क सुदामा संगवारी
आंख भर आये हैं पानी रे भैया
नही कोई इसका सानी है ।

मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

ग्वाला रे गोकुल के
हाहा हाहा हाहा
गोकुल के ग्वाला, गोकुल के ग्वाला
छेड़े है मुख लगाये घोले रे हाला मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

किशोरी रे बृज के
हाहा हाहा हाहा
बृज के राधा, बृज के राधा
फंस गई ओ तो प्रेम के व्याधा रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

राधा  रे श्याम के
हाहा हाहा हाहा
 ष्याम के दिवानी, श्याम के दिवानी
सुध बुध भुले सुन तान सुहानी रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

धेनु रे गोकुल के
हाहा हाहा हाहा
गोकुल धेनु, गोकुल के धेनु
ग्रास छोड़ धाये सुने जब वेणु रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

डाली रे कदम के
हाहा हाहा हाहा
कदम के डाली, कदम के डाली
आसन  बन कान्हा के नाचे रे मतवाली मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

गोपी रे गोकुल के
हाहा हाहा हाहा
गोकुल के गोपी, गोकुल के गोपी
बेसुध भई जल गागर रोकी रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से
मुरली से कोई बाचे न बचे रे मुरली से

रविवार, 9 नवंबर 2014

बड़ा तंग किना (भजन)

ओ मईयाजी ........
बड़ा तंग किन्हा
तेरे किसन ने बड़ा तंग किना -2
दूध दही चुराये, संग साथी बुलाये,
घर घुस चढ़ जावे ये जिना
बड़ा तंग किन्हा
तेरे किसन ने बड़ा तंग किना
ओ मईयाजी ........
बड़ा तंग किन्हा


ओ ग्वाला है हम ग्वालिन हैं-2
ओ बगिया है हम मालिन हैं
तेरे घर में माखन, खूब होगी मगर
उसने मेरा माखन छिना
बड़ा तंग किना 2

तेरे किसन ने बड़ा तंग किना
बड़ा तंग किना

हमारी सीका, हमारे मटके
ले हाथ उठा, उसे ओ पटके
खुद ना खाये, संग साथी खिलाये,
देख जहर का घूट पड़ा पीना

देख कर हमें, भागे ओ छलिया
कदम तल जा, छेड़े मुरलिया
सुन वेणु धुन, हम सुध बुध बिसराये
मुष्किल हुआ अब जीना

हम बावरी, ओ निरमोही
हम संग करे, ओ बरजोरी
उनके षरारत, हमसब को भी भाये
कैसे कहे हमें दुख दीना

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

नेताजी की महिमा गाथा (आल्हा)

नेताजी की महिमा गाथा, लोग भजन जैसे है गाय ।
लोकतंत्र के नायक वह तो, भाव रंग रंग के दिखाय ।।

नटनागर के माया जैसे, इनके माया समझ न आय ।
पल में तोला पल में मासा, कैसे कैसे रूप बनाय ।।

कभी कभी जनता संग खड़े, जन जन के मसीहा कहाय ।
मुफ्त बांटते राशन पानी, लेपटाप बिजली भरमाय ।

कभी मंहगाई पैदा कर, दीन दुखीयों को तड़पाय ।
बांट बेरोजगारी भत्ता, युवा शक्ति को ही भटकाय ।।

भस्मासुर बन करे तपस्या, जनता पर निज ध्यान लगाय ।
भांति भांति से करते पूजा, वह जनता को देव बनाय ।।

जनता जर्नादन बन भोले, उनको शासन डोर थमाय ।
सत्ता बल पाकर हाथों में, भोले जन को ही दौड़ाय ।

गली गली भाग रही जनता, अपने तो निज प्राण बचायं।
भाग्य विधाता जनता जिनके, नेताजी अब भाग्य बनाय ।

काम चाहिये हर हाथों में, अपनी एक नई पहचान ।
हाथ कटोरा देते क्यों हो, हमें चाहिये निज सम्मान ।।

जात पात में बाट बाट कर, खेलो मत शकुनी का खेल ।
हम सब पहले भारत वंशी, हर मजहब में रखते मेल ।।

छद्म संप्रदायवाद बुनकर, रचे महाभारत क्यों और ।
जग उपदेशक भारत अपना, कृष्ण बुद्ध गांधी का ठौर ।।

जनता जर्नादन भी सुन लो, सभी दोष नेता का नाय ।
हृदय हाथ रखकर सोचो तुम, नेता तुम को क्यो भरमाय ।।

जमीर खो गया कहां जग में, लोभ स्वार्थ का लेप लगाय ।
फोकट में पाने को कैसे, नेता के चम्मच बन आय ।।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

कर्तव्य क्या है ?

कर्तव्य क्या है ?
कोई नही जानते
 ऐसा नही है
 कोई नही चाहते
 कांटो पर चलना ।

     स्वार्थ के पर
    एक मानव अंग
    मानवीकृत
    मांगते अधिकार
    कर्तव्य भूल कर ।

लड़े लड़ाई
 अधिकारों के लिये
 अच्छी  बात है
 रखें याद यह भी
 कुछ कर्तव्य भी हैं ।

    जो चाहते हैं
    कर्तव्य परायण
    सेवक पुत्र
    वह स्वयं कहां है
    कर्तव्य परायण

रविवार, 2 नवंबर 2014

काले धन का हल्ला

छन्न पकैया छन्न पकैया, काले धन का हल्ला ।
चोरों के सरदारों ने जो, भरा स्वीस का गल्ला ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, कौन जीत अब लाये ।
चोर चोर मौसेरे भाई, किसको चोर बताये ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, सपना बहुत दिखाये ।
दिन आयेंगे अच्छे कह कह, हमको तो भरमाये ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, धन का लालच छोड़ो ।
होते चार बाट चोरी धन, इससे मुख तुम मोड़ो ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, काले गोरे परखो ।
कालों को दो काला पानी, बात बना मत टरको ।।  टरकना-मौका से हटना
....................................
मौलिक अप्रकाशित

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

कुछ दोहे

एक दीप तुम द्वार पर, रख आये हो आज ।
अंतस अंधेरा भरा, समझ न आया काज ।।

आज खुशी का पर्व है, मेटो मन संताप ।
अगर खुशी दे ना सको, देते क्यों परिताप ।।

पग पग पीडि़त लोग हैं, निर्धन अरू धनवान ।
पीड़ा मन की छोभ है, मानव का परिधान ।।

काम सीख देना सहज, करना क्या आसान ।
लोग सभी हैं जानते, धरे नही हैं ध्यान ।।

मन के हारे हार है, मन से तू मत हार ।
काया मन की दास है, करे नही प्रतिकार ।।

बात ज्ञान की है बड़ी, कैसे दे अंजाम ।
काया अति सुकुमार है, कौन करेगा काम ।।

नुख्श खोजते क्यों भला, ज्ञानी पंडित लोग ।
अपनी गलती भूल कर, जग में करते खोज ।।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

दीप पर्व है

     दीप पर्व है
    अज्ञानता को मेटो
    ज्ञान दीप ले
    मानवता को देखो
    प्रेम ही प्रेम भरा

     नन्हे दीपक
    अंधियारा हरते
    राह दिखाते
    स्वयं अंधेरे बैठे
    घमंड छोड़ कर

    सुख समृद्धि
    घर भरा पूरा हो
    मन में शांति
    दीपक का प्रकाश
    प्रकाशित अचल

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

भारतीय रेल

रेल के रेलम पेल में, जल्दबाजी के खेल में, छत पर चढ़ रहे, देखो नर नारीयां ।
जान जोखिम में डाल, गोद में बच्चे सम्हाल, दिखा रहें हैं वीरता, दक्ष सवारीयां ।।
अबला सबला भई, दुर्गावती लक्ष्मी बन, लांघ रही वह बोगी, छत में ठौर पाने ।
कौन इन्हें समझायें, जीवन मोल बतायें, क्यों करते नादानी, रेल के दीवाने ।।

रेल-रेल भारतीय रेल, रेल है ऐसा जिसके़, अंदर को कौन कहे, छत भी गुलजार है ।
बेटिकट बेखटका, रेलवे को दे झटका, कह रहे छाती ठोक, रेलवे बीमार है ।।
भारतीय रेल पर, टिकटों के खेल पर, दलाल मालामाल है, जनता लाचार है ।
फस्ट सेकण्ड स्वीपर, ए.सी. के अनुपात में, लगें हैं जनरल का, और दरकार है ।।

यहां-वहां जहां-तहां, देख सको जहां जहां, देखो तुम वहां वहां, समस्या ही खड़ा है ।
हर कोई जानता है, नही कोई मानता है, समस्या पैदा करने, आदमी ही अड़ा है ।।
समस्या को बुनते है, समस्या से जुझते है, समस्या में रहते हैं, लोग बन समस्या ।
उलझन को जो हेरे, उलझन का दास है, दास को सुलझाना, खुद एक समस्या ।।

नित्य-नित्य पखारते, चरण वतन के

मां भारती के शान को, अस्मिता स्वाभिमान को,
अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के ।
सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण,
चौकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के ।
चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर,
जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के ।
खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर,
लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के ।

हाथ कूदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये,
श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक वतन के ।
कंधो पर हल धर, मन में उमंग भर,
अन्न-धन्न पैदा करे, कृषक वतन के ।
व्यपारी बड़े काम के, निपुण साम दाम के,
उन्नत करते माथा, उद्यमी वतन के ।
खास आम लोग सब, राष्ट्र प्रेम उर धर,
नित्य-नित्य पखारते, चरण वतन के ।

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

फैंशन के चक्कर में (घनाक्षरी छंद)

फैंशन के चक्कर में, पश्चिम के टक्कर में
भूले निज संस्कारों को, हिन्द नर नारियां ।
अश्लील गीत गान को, नंगाय परिधान को
शर्म हया के देश में, मिलती क्यों तालियां ।
भाई कहके नंगों को, दादा कह लफंगो को,
रक्त जनित संबंधो को, दे रहे क्यों गालियां ।
दुआ-सलाम छोड़ के, राम से नाता तोड़ के
हाय हैलो बोल-बोल, हिलाते हथेलियां ।

हया रखे ताक पर, तंग वस्त्र धार कर,
लोकलाज कुरेदतीं, आज की लड़कियां ।
नुपूर के छन-छन, कंगना के खन-खन,
नवयुवतियों को देती, मानो कोई गालियां ।
साडि़यां षरमाती है, घाघरा घबराती है,
सामने हो जब कोई, आज की लड़कियां ।
छोड़ सखी सहेली को, नारीत्व के पहेली को
लड़को को मित्र बनाती, आज की लड़कियां ।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

जग की यह माया

आत्मा अमर
शरीर छोड़कर
घट अंदर
तड़पती रहती
ऊहा पोह मे
इच्छा शक्ति के तले
असीम आस
क्या करे क्या ना करे
नन्ही सी आत्मा
भटकाता रहता
मन बावला
प्रपंच फंसकर
जग ढूंढता
सुख चैन का निंद
जगजाहिर
मन आत्मा की बैर
घुन सा पीसे
पंच तत्व की काया
जग की यह माया

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

गांव के पुरवासी

बेटवा सुन
गांव देखा है कभी
दादी पूछते
नही दादी नही तो
किताब पढ़
जाना है मैं गांव को
भारत देश
किसानों का देश है
कृषि प्रधान
गांवो में बसते हैं
किसान लोग
मवेशियों के साथ
खेती करते
हां  बेटा हां
गांव किसानों का है
थोड़ा जुदा है
तेरे किताबों से रे
अपना गांव
गांव की शरारत
अल्हड़ प्यार
लोगों के नाते रिश्ते
खुली बयार
खुला खुला आसमा
खुली धरती
तलाब के किनारे
आम के छांव
लगे बच्चों का डेरा
खेल खेल में
खिलते बचपन
सखी सहेली
पक्षी बन चहके
गली आंगन
पुष्प बन महके
मुर्गे की बांग सुन
छोड़ बिछौना
जागे हैं नर नारी
नीम की डाल
दातून को चबाते
काली मिट्टी को
बदन में लगाते
खुले में नीर
मल मल नहाते
खेती का काम
लोग करे तमाम
माटी की सेवा
श्रद्धा के साथ करे
छेड़े हैं गीत
खेत खलिहानों में
अन्न की दाना
जगत को बांटते
प्रेम के साथ
स्नेह पुष्प खिलाते
एक दूजे के
सुख दुख के साथी
गांव के पुरवासी ।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

सोचें जरा (तांका)

1.     शरम हया
    लड़की का श्रृंगार
    लड़को का क्या
    लोक मर्यादा नोचे
    इसको कौन  सोचे ।

2.    नर नारी का
    समता वाजिब है
    रसोई घर
    चैका करे पुरूष
    दफ्तर नारी साजे ।

3.    सोचें हैं कभी
    रूपहले पर्दे में
    नग्नतावाद
    कैसे पसारे पांव
    मूक दर्शक आप ।

4.    कम कपड़े
    कोई क्यो पहनते
    हवा खाना हो
    नंगे होकर बैठें
    पागल के समान ।

5.    खुली चुनौती
    वासना को देते
    खुले बदन
    बजा रहें हैं ढोल
    मर्यादा साधे मौन ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

करना है आराम (चोका)

ढलती शाम
दिन का अवसान
देती विराम
भागम भाग भरी
दिनचर्या को
आमंत्रण दे रही
चिरशांति को
निःशब्द अव्यक्त
बाहें फैलाय
आंचल में ढक्कने
निंद में लोग
होकर मदहोश
देखे सपने
दिन के घटनाएं
चलचित्र सा
पल पल बदले
रोते हॅसते
कुछ भले व बुरे
वांछित अवांछित
आधे अधूरे
नयनों के सपने
हुई सुबह
फिर भागम भाग
अंधड़ दौड़
जीवन का अस्तित्व
आखीर क्या है
मृत्यु के शैय्या पर
सोच रहा मानव
गुजर गया
जीवन एक दिन
आ गई शाम
करना है आराम
शरीर छोड़ कर ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

बुधवार, 24 सितंबर 2014

एक सौ एक हाइकू

1.    हे गजानन
    कलम के देवता
    रखना लाज ।

2.    ज्ञान दायनी
    हर लीजिये तम
    अज्ञान मेट ।

3.    आजादी पर्व
    धर्म धर्म का पर्व
    देश  का गर्व.   

4.    पाले सपना ?
    आजादी के सिपाही
    मिले आजादी ?

5.    स्वतंत्र तंत्र
    विचार परतंत्र
    देश स्वतंत्र ?

6.    कहां है खादी ?
    कैसे भरे संस्कार ?
    गांधी विचार ।
   
7.    मानव कढ़े
    हर चेहरा पढ़े
    विकास गढ़े ।
   

8.    राजनीतिज्ञ,
    कुशल अभिनेता,
    मूक दर्शक।

9.    कुटनीतिज्ञ
    कुशल राजनेता
    मित्र ही शत्रु ।

10.    शकुनी नेता
    लोकतंत्र चैसर
    बिसात लोग

11.    लोकराज है
    लोभ मोह में लोग
    क्यो करे शोक

12.    अपनत्व है ?
    देश से सरोकार ?
    सब बेकार ।

13.    धड़क रही
    दिल की धड़कन,
    तेरे प्यार में ।

14.    हे अनुराग,
    प्रेम एक पूजा है,
    स्वच्छ निर्मल ।

15.    श्वास प्रश्वास
    अधर पर नाम
    स्नेही साजन ।

16.    प्रीत की रीत,
    जल मरे पतंगा
    सुधा पीकर ।

17.    चांद विहिन
    पूर्णमासी का रात,
    तू मेरी चांद ।

18.    तेरे बीना मै,
    तेल बीन दीपक,
    वजूदहीन ।

19.    मन की साथी,
    चिडि़या हो चहको,
    खुला आंगन ।

20.    सारे जहां में
    भारत यशगान
    गीत बन गया ।

21.    आतंकवाद
    गर्दन रेत कर,
    करे संवाद ।

22.    घोसले जैसे
    बनते बिखरते
    क्यों परिवार ?

23.    सात जन्मो का,
    मान्यता स्वीकारे जो
    तलाक मांगे ।

24.    काम व पैसा,
    तेरा सब कुछ है,
    ईश्वर नही ।

25.    ईश्वर सदा,
    कण कण बसता,
    हवा स्वास सा ।

26.    संस्कारी बन,
    संस्कृति संवाहक,
     भारतवासी ।

27.    अनुभव से,
    ता उम्र सीखा जीना,
    पेड़ समान ।

28.    मुझसे प्यार,
    कोई करे न करे,
    मैं तो करूंगा ।

29.    गोताखोर मै,
    दिल की गइराई
    समुद्र तल ।

30.    ढूंढ रहा मै
    अनंत गहराई
    कहां समाई ?

31.    सादा जीवन,
    मर्यादित पिंजरा,
    कैद सज्जन ।

32.    लक्ष्मण रेखा,
    लांघ सके है कौन,
    दैत्य रावन । 

33.    जीवन है क्या ?
    मन का यक्ष प्रश्न
    सुख या दुख ।

34.    मनबावला
    पथ भूला राही है,
    जग भवर ।
       
35.    देख दुनिया,
    जीने का मन नही,
    स्वार्थ के नाते ।

36.    मन भरा है,
    ऐसी मिली सौगात,
    बेवाफाई का ।

37.    वाह रे धोखा,
    अपने ही पराये,
    मित्र ही शत्रु ।

38.    तू भी पूता है ?
    मित्रता के रंग में,
    कहां है जुदा ?

39.    क्यों रोता है ?
    सिक्के के दो पहलू
    होगी सुबह ।

40.      प्रेम की रीत,
    हार में ही है जीत,
    हारना सीख ।

41.    प्रेम क्या है ?
    भावों का समर्पण
    स्वप्रस्फूटित ।

42.    वियोग क्या ?
    प्रेम की गहराई
    तैराक मन ।

43.    हे भगवान,
    प्रेम का भूखा तू भी,
    प्रेम ही पूजा ।

44.    मीड डे मील,
    बच्चे हैं बुद्धिहिन,
    कैसी योजना ।

45.    ये शिक्षानिति
    हमारी पाठशाला,
    प्रयोग शाला ।

46.    मीड डे मील,
    मौत के सौदागर
    मासूम बच्चे ।

47.    हे मुफ्तखोर
    भ्रष्टाचारी मानव,
    निज मान है ?

48.    झूमा सावन,
    आसुओं की है झड़ी
    प्रतिक्षा शेष ।

49.    फैला प्रकाश
    चमकती बिजली
    मन उदास

50.    बरसे मेघ
    टपकता छप्पर
    गरीब घर

51.    बाढ़ का पीर
    सड़को पर नीर
    बेबस जन

52.    बद्री केदार,
    हिमालय प्रकोप
    आस्था का मारा

53.    विष्णु सा वह,
    ब्रह्मा महेश वह,
     गुरू जो वह

54.    स्वर्ग का पथ
    चरित्र व्यवहार
    निर्माता गुरू

55.    एक चेहरा
    जाना पहचाना सा
    अनजाना है ।

56.    सुनता कोई,
    गुनगुनाता है कोई
    मैं तो मौन हूं ।
57.    सुस्त रूपया
    लुड़कता बाजार
    देश बेहाल ।

58.    सीमा की सीमा
    खो रही पहचान
    चीन शैतान ।

59.    सावन लाये
    रिमझिम फुहार
    दिल बीमार

60.    बदली छाई
    धरती मुस्कुराई
    प्यास  बुझाई

61.    खेती का काम
    करते हैं किसान
    पालनकर्ता ।

62.    दोस्त रूठा है
    करूं क्या जतन मैं
    कोई बताये ।

63.    भ्रष्ट प्रत्याशी
    लालची मतदाता,
    लोकतंत्र है ?

64.    पढ़े लिखे हो ?
    डाले हो कभी वोट ?
    क्यो देते दोष ??

65.    देख लो भाई,
    कौन नेता  चिटर ?
    तुम वोटर ।

66.    अमीट स्याही
    खामोश रहकर
    करते चोट ।

67.    क्यों मानते हो ?
    ये देश तुम्हारा है ?
    मौन क्यों भाई ??

68.    सुन रे आली,
    मैं बाग का हूं माली,
    सजाओ थाली ।

69.    ढूंढते हुये
    भ्रष्टाचार का पथ
    खुद खो गया ।

70.    हम आजाद
    वे सभी कह रहे
    मर्यादाहीन

71.    स्वतंत्र देश
    परतंत्र शसक
    ये कैसा नाता ?

72.    तन कैद में
    मन आजाद रखे
    मेरे शहीद ।

73.    देख तमाशा
    नेता मांगते भीख
    लोकतंत्र है ।

74.    जांच परख
    आंखो देखी गवाह
    तुम्ही हो जज ।

75.    खोलता वह
    आश्वासनों का बाक्स
    सम्हलो जरा ।

76.    कागजी फूल
    चढ़ावा लाया वह
    हे जन देव ।

77.    मदिरा स्नान
    गहरा षडयंत्र
    बेसुध लोग ।

78.    चुनोगे कैसे ?
    लड़खड़ाते पांव
    ड़ोलते हाथ ?

79.    होश में ज्ञानी
    घर बैठे अज्ञानी
    निर्लिप्त भाव ।

80.    जड़ भरत
    देश के बुद्धिजीवी
    करे संताप ।
   
81    वह आदमी
    बकबक कर रहा
    मदहोश हो ।

82.    टूटता घर,
    अपना परिवार,
    स्नेह दुलार ।

83.    रूठे अपने,
    टूट रहे सपने,
    ढूंढे छुपने ।

84.    कहीं दिखे है ?
    एकसाथ हैं भाई ?
    दुलार करें ।
85.    संस्कार लुप्त,
    परम्परा सुसुप्त
    कौन है तृप्त ?

86.    संस्कार क्या है ?
    कौन नही जानता ?
    कौन मानता ??

87.    नवाचारीय,
    कैसे बनी कुरीति ?
    अपनी रीति ।

88.    मान सम्मान,
    परम्परा का पालन
    मनभावन ।

89.    आत्म सम्मान
    प्राणों से बढ़कर
    बचा लो तुम ।

90.    हिन्द की हिन्दी
    जन मन की जुबा
    होगी की नही ?

91.    बुरा नही है
    ज्ञान जो हम जाने
    इस जग का ।

92.    देश की चिंता
    हमें भी हैं करना
    बन सपूत ।

93.    बने विजेता
    निज मन जो जीते
    विश्व विजेता ।

94.    काशी जो छाये
    शरद ऋतु आये
    प्रेम जगाये ।

95.    जान लो मुझे
    तेरे ही घटवासी
    मै अविनाशी ।

96.    नन्हा बालक
    भगवान समान
    स्वच्छ निर्मल ।

97.    धूप छांव सा
    जीवन बगिया में
    सुख दुख है ।

98.    झोंको के साथ
    झूमके नन्हा पौधा
    खड़ा रहता ।

99.    छोड़ मां बाप
    मनाये बद्रीनाथ
    पूत आज के ।

100.    लोक मर्यादा
    परिधान समान
    सज्जन ओढ़े ।

101.    अनुशासन
    कोई रोके न टोके
    निज अंकुश

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सत्यमेव जयते (छप्पय छंद)

सत्य नाम साहेब, शिष्य कबीर के कहते ।
राम नाम है सत्य, अंत पल तो हम जपते ।।
करें सत्य की खोज, आत्म चिंतन आप करें ।
अन्वेषण से प्राप्त, सत्य को ही आप वरें ।।
शाश्वत है सत्य नष्वर जग, सत्य प्रलय में षेश है ।
सत्यमेव  जयते सृश्टि में, शंका ना लवलेष है ।।

असत्य बन कर मेघ, सत्य रवि ढकना चाहे ।
कुछ पल को भर दंभ, नाच ले वह मनचाहे ।।
मिलकर राहू केतु, चंद्र रवि को कब तक घेरे ।
चाहे हो कुछ देर, अंत जीते सत तेरे ।।
सत्य सत्य ही तो सत्य है, सत बल सृष्टि विशेषहै ।
सत्यमेव  जयते सृशष्टि में, शंका ना लवलेश है ।।

पट्टी बांधे आंख, ढूंढ़ते सत को मग में ।
अंधेरे का साथ, निभाते फिरते जग में ।।
उठा रहे हैं प्रश्न, कौन सच का साथी है ।
कहां जगत में आज, एक भी सत्यवादी है ।।
सत्यवादी तो खुद आप है, तुम में जो सच शेष है ।
सत्यमेव  जयते सृष्टि में, शंका ना लवलेश है ।।

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

सावन (गीतिका छंद)

हर हर महादेव
.....................
माह सावन है लुभावन, वास भोलेनाथ का ।
आरती पूजा करे हम, व्रत भी भोलेनाथ का ।।
लोग पार्थिव देव पूजे, नित्य नव नव रूप से ।
कामना सब पूर्ण करते, ले उबारे कूप से ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

सावन

ये रिमझिम सावन, अति मन भावन, करते पावन, रज कण को ।
हर मन को हरती, अपनी धरती, प्रमुदित करती, जन जन को ।
है कलकल करती, नदियां बहती, झर झर झरते, अब झरने ।
सब ताल तलैया, डूबे भैया, लोग लगे हैं, अब डरने ।।
--------------------------------------------------------
-रमेशकुमार सिंह चौहान

दोहे -रूपया ईश्वर है नही

काम काम दिन रात है, पैसे की दरकार ।
और और की चाह में, हुये सोच बीमार ।।

रूपया ईश्वर है नही, पर सब टेके माथ ।
जीवन समझे धन्य हम, इनको पाकर साथ ।।

मंदिर मस्जिद देव से, करते हम फरियाद ।
अल्ला मेरे जेब भर, पसरा भौतिक वाद ।।

निर्धनता अभिशाप है, निश्चित समझे आप ।
कोष बड़ा संतोष है, मत कर तू संताप ।।

धरे हाथ पर हाथ तू, सपना मत तो देख ।
करो जगत में काम तुम, मिटे हाथ की रेख ।।

बात नही यह दोहरी,  है यही गूढ ज्ञान ।
धन तो इतना चाहिये, जीवन का हो मान ।।
.....................................
-रमेशकुमार सिंह चौहान

बुधवार, 6 अगस्त 2014

मेरे नगर नवागढ़ में बाढ़ का एक दृश्य



गीतिका छंद
 .............................................

मेघ बरसे आज ऐसे , मुक्त उन्मुक्त सा लगे ।
देख कर चहु ओर जल को, देखने सब जा जुटे ।।
नीर बहते तोड़ तट को, अब लगे पथ भी नदी ।
गांव घर तक आ गया जल, है मची कुछ खलबली ।।

हाट औ बाजार में भी, धार पानी की चली ।
पार करते कुछ युवक तो, मौज मस्ती में गली ।।
ढह गये कुछ घर यहां पर, जो बने थे तट नदी ।
जो नदी को रोक बैठे, सीख कुछ तो ले अभी ।
-रमेशकुमार सिंह चौहान

रविवार, 3 अगस्त 2014

दोहे


लाभ हानि के प्रश्न तज, माने गुरू की बात ।
गुरू गुरूता गंभीर है, उलझन झंझावात ।।

सीख सनातन धर्म का, मातु पिता भगवान ।
जग की चिंता छोड़ तू, कर उनका सम्मान ।।


पढ़े लिखे हो घोर तुम, जो अक्रांता सुझाय ।
निज माटी के सीख को, तुम तो दिये भुलाय ।।

अपनी सारी रीतियां, कुरीति होती आज ।
परम्परा की बात से, तुमको आती लाज  ।।

इतने ज्ञानी भये तुम, पूर्वज लागे मूर्ख ।
बनके जेंटल मेन अब, कहते सबको धूर्त ।।

माना तेरे ज्ञान से, सरल हुये सब काम ।
पर समाज परिवार तो, रहा नही अब धाम ।।

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

रहना तुम सचेत (रोला छंद)

मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।
मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।
रहना तुम सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।
हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।

मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।
खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।
इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।
बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्‍मनी का लगाये ।। रहना तुम सचेत ....

यह तो भारत देश्‍ा, लगे उपवन फूलों का ।
माली न बने चोर,कष्‍ट दे जो श्‍ाूलों का ।।
रखना हमको ध्यान, बांट वो हमें न पावे ।
वो तो अपने स्वार्थ, आज तो आग लगावे ।। रहना तुम सचेत ....

तू जो करे अजान, करूं मै ईश्‍वर पूजा ।
ईश्‍वर अल्ला नाम, नही हो सकते दूजा ।।
करते हम सम्मान, एक दूजे को भाये ।
हमें मिले जो श्‍ाांति, और जन जान न पाये ।। रहना तुम सचेत ....


हाड़ मांस का देह, रक्त में भी है लाली ।
हिन्दू मुस्लिम पूर्व, रहे हम मानव खुश्‍ाहाली ।।
दिये हमारे बाप, सीख जो उसे निभायें ।
अब कौमी के गीत, साथ मिलकर हम गायें । रहना तुम सचेत ....

बुधवार, 30 जुलाई 2014

सर्कस


खेल सर्कस का दिखाये, ले हथेली प्राण को ।
डोर पथ पर चल सके हैं, संतुलित कर ध्यान जो ।।
एक पहिये का तमाशा, जो दिखाता आज है ।
साधना साधे सफलतम, पूर्ण करता काज है ।।

काम जोखिम से भरा यह, पेट खातिर वह करे ।
अंर्तमन दुख को छुपा कर,हर्ष सबके मन भरे ।।
लोग सब ताली बजाते, देख उनके दांव को ।
आवरण देखे सभी तो, देख पाये ना घाव को ।।

ये जगत भी एक सर्कस, लोग करतबबाज हैं ।
जूझते जो उलझनो से, सृष्टि के सरताज हैं ।।
ध्येय पथ पर बढ़ चलो तुम, डोर जैसे नट चले।
दुख जगत का एक पहिया, तुम चलो इसके तले ।।
-रमेशकुमार सिंह चैहान

रविवार, 27 जुलाई 2014

पहेली बूझ

1.  पहेली बूझ !
जगपालक कौन ?
क्यो तू मौन ।
नही सुझता कुछ ?
भूखे हो तुम ??
नही भाई नही तो
बता क्या खाये ?
तुम कहां से पाये ??
लगा अंदाज
क्या बाजार से लाये ?
जरा विचार
कैसे चले व्यापार ?
बाजार पेड़??
कौन देता अनाज ?
लगा अंदाज
हां भाई पेड़ पौधे ।
क्या जवाब है !
खुद उगते पेड़ ?
वे अन्न देते ??
पेड़ उगे भी तो हैं ?
उगे भी पेड़ !
क्या पेट भरते हैं ?
पेट पालक ??
सीधे सीधे नही तो
फिर सोच तू
कैसे होते पोशण
कोई उगाता
पेड़ पौधे दे अन्न
कौन उगाता ?
किसका प्राण कर्म ?
समझा मर्म
वह जग का शान
वह तो है किसान ।
2.घने जंगल
वह भटक गया
साथी न कोई
आगे बढ़ता रहा
ढ़ूंढ़ते पथ
छटपटाता रहा
सूझा न राह
वह लगाया टेर
देव हे देव
सहाय करो मेरी
दिव्य प्रकाष
प्रकाशित जंगल
प्रकटा देव
किया वह वंदन
मानव है तू ?
देव करे सवाल
उत्तर तो दो
मानवता कहां है ?
महानतम
मैने बनाया तुझे
सृष्टि रक्षक
मत बन भक्षक
प्राणी जगत
सभी रचना मेरी
सिरमौर तू
मुखिया मुख जैसा
पोशण कर सदा ।
3.कौन है सुखी ?
इस जगत बीच
कौन श्रेष्ठ है ?
करे विचार
किसे पल्वित करे
सापेक्षवाद
परिणाम साधक
वह सुखी हैं
संतोष के सापेक्ष
वह दुखी है
आकांक्षा के सापेक्ष
अभाव पर
उसका महत्व है
भूखा इंसान
भोजन ढूंढता है
पेट भरा है
वह स्वाद ढूंढता
कैद में पक्षी
मन से उड़ता है
कैसा आश्चर्य
ऐसे है मानव भी
स्वतंत्र तन
मन परतंत्र है
कहते सभी
बंधनों से स्वतंत्र
हम आजाद है रे ।
4.रोपा है पौध
रक्त सिंचित कर
निर्लिप्त भाव
जीवन की उर्वरा
अर्पण कर
लाल ओ मेरे लाल
जीवन पथ
सुघ्घड़ संवारते
चुनते कांटे
हाथ आ गई झुर्री
लाठी बन तू
हाथ कांप रहा है
अंतःकरण,
प्रस्पंदित आकांक्षा,
अमूर्त पड़ा
मूर्त करना अब,
सारे सपने,
अनगढ़े लालसा
प्रतिबम्ब है
तू तन मन मेरा
जीवन समर्पण ।
5.चारू चरण
चारण बनकर
श्रृंगार रस
छेड़ती पद चाप
नुुपूर बोल
वह लाजवंती है
संदेश देती
पैर की लाली
पथ चिन्ह गढ़ती
उन्मुक्त ध्वनि
कमरबंध बोले
लचके होले
होले सुघ्घड़ चाल
रति लजावे
चुड़ी कंगन हाथ,
हथेली लाली
मेहंदी मुखरित
स्वर्ण माणिक
ग्रीवा करे चुम्बन
धड़की छाती
झुमती बाला कान
उभरी लट
मांगमोती ललाट
भौहे मध्य टिकली
झपकती पलके
नथुली नाक
हंसी उभरे गाल
ओष्ठ गुलाबी
चंचल चितवन
गोरा बदन
श्वेत निर्मल मन
मेरे अंतस
छेड़ती है रागनी
प्राण सम सजनी ।।
6.कौन करे है ?
देश में भ्रष्टाचार,
हमारे नेता,
नेताओं के चम्मच
आम जनता
शासक अधिकारी
सभी कहते
हाय तौबा धिक्कार
थूक रहे हैं
एक दूसरे पर
ये जानते ना कोई
नही नही रे
मानते नही कोई
तुम ही तो हो
मै भी उनके साथ
बेकार की है बात ।

7.सभ्यसमाज
एक कुशल माली
बेटी की पौध
रोपते जतन से
पल्लवित होकर
नन्ही सी पौध
अटखेलियां करे
गुनगुनाती हुई
पुष्पित होती
महके चारो ओर
करे जतन
तोड़े ना कोई चोर
जग बगिया
बेटी जिसकी शोभा
गढ़े गौरव गाथा ।
8.तारें आकश
दीनकर प्रकाश
धरती रज
समुद्र जल निधि
ईश्वर दया
माप सका है कौन
जगत मौन
ममता का आंचल
गोद में शिशु
रक्त दान करती
वात्सल्य स्नेह वह

हम आजाद है हम आजाद है

पक्षीय गगन चहके गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
नदीयां बहती करती कलकल
हम आजाद है हम आजाद है
तरू शाखा लहराये और गाये
हम आजाद है हम आजाद है
मृग उछलते नाचते गाते गीत
हम आजाद है हम आजाद है
मयूर पसारे पंख नाचे गाये
हम आजाद है हम आजाद है
तन प्रफूल्लित मन प्रफूल्लित
हम आजाद है हम आजाद है
मन सोचे प्रकति अनुकूल
तन झूमे प्रकृति अनुकूल
प्रकृति अनुशासन में रहके बोले
हम आजाद है हम आजाद है ।।

अब जमाना लग रहे रूपहले

अब जमाना लग रहे रूपहले 
याद आ रहा है मुझे  एक बात,
मेरे दादाजी ने जो कहे एक रात ।
धरती पर स्वर्ग लगते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

भुले बिसरे से लगते अब हमारे संस्कार,
परम्पराओं पर भारी पड़ रहे अब नवाचार ।
परम्पराओं पर जान छिड़कते थे लोग पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

मेरे माता पिता ने सिखये जो रीति,
तेरे पापा उसे ही तो कह रहे कुरीति ।
हर रीति में नीति होते थे पहले
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

कहते अब ‘हम दो हमारे दो‘ प्यारे,
हमें क्या रहने दो और रिष्ते सारे ।
एक छप्पर तले जीते थे हम पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

अब मान कहां धरम ईमान का,
अब कीमत कहां जुबान का ।
अब कहां छोटे बड़े का मान है,
सभी के सम्मान होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।


मर्यादाओं का सीमा टूट रहे,
युवक युवती मजे लूट रहे ।
अब चेहरा श्वेत होवे न श्याम
मुंह काले हो जाते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

दाम्पत्य जीवन टूट रहे,
नर नारी में आक्रोश फूट रहे ।
पति पत्नि का सम्मान आ गया बाजार,
जो घर के अंदर कैद होते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

परिवार के आधार टूट रहे,
परम्पराओं के दामन छूट रहे ।
संस्कार पथ छोड़े हो रहे ये हाल,
‘सादा जीवन उच्च विचार‘ से जीते थे पहले,
अब जमाना लग रहे रूपहले ।

गुरू

जब छाये अंधेरा रोशनी फैलाता है गुरू,
अंधे का लाड़ी बन मार्ग दिखाता है गुरू ।

कहते है ब्रह्मा बिष्णु महेश है चाकर आपके गुरू,
निज सर्मपण से पड़ा चरण आकर आपके गुरू ।

न पूजा न पाठ न ही है मुझको कोई ज्ञान गुरू,
चरण शरण पड़ा बस निहारता आपके चरणकमल गुरू ।

सारे अपराधो से सना तन मन  है मेरा गुरू,
अपराध बोध से चरण पड़ा तेरे गुरू ।

दयावंत आप हे कृपालु भी आप है गुरू,
दया की नजर से मुझे एक बार निहारो गुरू ।

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।

भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।

डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।

निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नई सबेरा है ।

राही कोई और हो न सही,
अपने आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है ।

एक गौरेया की पुकार

एक गौरैया एक मनुज से कहती है ये बोल,
हे बुद्विमान प्राणी हमारे जीवन का क्या है मोल ।

अपने हर प्रगति को अब तो जरा लो तोल,
सृष्टि के कण-कण में दिया है तूने विष घोल ।

क्या हम नही कर सकते कल कल्लोल,
क्यो हो रही  हमारी नित्य क्रिया कपोल ।

इस सृष्टि में क्या हम नही सकते हिल-डोल,
हे मनुज अब तो अपना मनुष्यता का पिटारा खोल ।

जो तेरा है वो मेरा भी है सारा सृष्टि-खगोल,
फिर क्यो बिगाड़ते रहे हो हमारा भूगोल ।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

बरखा रानी


मानसून ढूंढे पथ अपना । कृषक बुने जीवन का सपना
पलक पावड़े बिछाय पथ पर । सभी निहारे अपलक नभ पर

बरखा रानी क्यो रूठी है । धरती अब तक तो सूखी है
आशाढ़ मास बितने को है । कृषक नैन अब रिसने को है

आने को है अब तो सावन । यह जो अब मत लगे डरावन
हे बरखा अब झलक दिखाओ । हमें और ना अधिक सताओ

उमड़ घुमड़ के अब तो आओ । धरती के तुम प्यास बुझाओ
छप्प छप्प खेलेंगे बच्चे । बहते जल पर उछल उछल के
-रमेशकुमार सिंह चौहान

सोमवार, 30 जून 2014

महंगाई

बढ़े महंगाई, करे कमाई, जो जमाखोर, मनमानी ।
सरकारी ढर्रा, जाने जर्रा, है सांठ गांठ, अभिमानी ।।
अब कौन हमारे, लोग पुकारे, जो करे रक्षा, हम सब की ।
सीखें अर्थशास्त्र, भुल पाकशास्त्र, या करें भजन, अब रब की ।।
-रमेशकुमार सिंह  चौहान

रविवार, 29 जून 2014

पीपल का पेड़ (गीतिका छंद)

पेड़ पीपल का खड़ा है, एक मेरे गांव में ।
शांति पाते लोग सारे , बैठ जिसके छांव में ।।
शाख उन्नत माथ जिसका, पर्ण चंचल शान है ।
हर्ष दुख में साथ रहते, गांव का अभिमान है ।।

पर्ण जिसके गीत गाते, नाचती है डालियां ।
कोपले धानीय जिसके, है बजाती तालियां ।।
मंद शीतल वायु देते, दे रहे औषध कई ।
पूज्य दादा सम हमारे, सीख देते जो नई।

नीर डाले मूल उनके, भक्त आस्थावान जो ।
कामना वह पूर्ण करते, चक्रधारी बिष्णु हो ।।
सर्वव्यापी सा उगे जो, हो जहां मिट्टी नमी ।।
कृष्ण गीता में कहें हैं, पेड़ में पीपल हमी ।

मंगलवार, 17 जून 2014

तांका (लघु कविता)

तांका लघु कविता

1. 
 तितली रानी
सुवासित सुमन
पुष्प दीवानी
आलोकित चमन
नाचती नचाती है ।
2. 
पुष्प की डाली
रंग बिरंगे फूल
हर्षित आली
मदहोश हृदय
कोमल पंखुडि़यां ।
3. 
जुगनू देख
लहर लहरायें
चमके तारे
निज उर प्रकाश
डगर बगराये ।
4. 
 कैसी आशिक
जल मरे पतंगा
जीवन लक्ष्य
मिलना प्रियतम
एक तरफा प्यार ।
5. 
 चिंतन करो
चिंता चिता की राह
क्या समाधान
व्यस्त रखो जी तन
मस्त रखो जी मन ।।
6. 
 हर चुनाव
बदले तकदीर
नेताओं का ही
सोचती रह जाती
ये जनता बेचारी ।।
7.  
लूटते सभी
सरकारी संपदा
कम या ज्यादा
टैक्स व काम चोर
इल्जाम नेता सिर ।।
8. 
 उठा रहे है
नजायज फायदा
चल रही है
सरकारी योजना
अमीर गरीब हो ।।
9.
 जनता चोर
नेता है महाचोर
शर्म शर्माती
कदाचरण लगे
सदाचरण सम ।।
10.  
जल भीतर
अटखेली करते
मीनो का झुण्ड़
सड़ा एक मछली
दुषित सारे नीर।।
11.  
श्रम की पूजा
कर्मवीर बनाते
भाग्य की रेखा
स्वर्णिम लगते हैं
श्रम अंकित हस्त ।
12. 
 मई दिवस
मजदूर सम्मान
विश्व करते
श्रम का यशगान
श्रमवीर महान ।।
13. 
 दिन का स्वप्न
देख रहा है वह
नाचता मन
बंधे हाथ पैर है
कैसे मिलेगी खुशी ।।
14. 
 भोग किया है
कठोर वनवास
अवध राजा राम
श्रम की साधना से
बने वो भगवान ।।
15. 
 शिक्षा व्यपार
बिकती है उपाधि
किताबी कीड़े
कुचले जा रहे यहां
ढूंढते रोजगार ।
16.
  दोष किसका ?
रोज हो रहे रेप
स्वतंत्र कौन ?
नेता या सरकार
निरंकुश समाज ।
17. 
 कर्तव्य क्या है ?
राम जाने हमें क्या
हक की चाह
हमें क्या परवाह
अपना काम सधे ।

शनिवार, 24 मई 2014

गजल


तेरे होने का मतलब चूडियाॅं समझती हैं
आंख में चमक क्यों हैं पुतलियाॅं समझती है

ये बदन का इठलाना और मन का मिचलाना
गूंथे हुये गजरों की बालियाॅं समझती है

हो तुम्ही तो मेरे श्रृंगार की वजह सारे
इस वजूदगी को हर इंद्रियाॅं  समझती है

श्वास तेरे मेरे जो एक हो गये उस पल
एहसास को तो ये झपकियाॅं समझती है

साथ देना तुम पूरे उम्र भर वफादारी से
बेवफाई को कातिल  सिसकियाॅं  समझती है
............................................
-रमेश कुमार चाैहान

रविवार, 4 मई 2014

जरा मुस्कुराकर

नेताजी से एक बार,
पूछ लिया एक पत्रकार ।
हे महानुभाव
तुम्हारे जीतने के क्या हैं राज ?
जनता जर्नादन है
मैं उनका पुजारी
नेताजी कहे सीर झुका कर ।
जलाभिशेक करता
कई बोतल लाल पानी चढ़ाकर ।
भांति भांति के भेट
मैं अपने देव चढ़ाता
अपनी मनोकामना
उनसे कह कह कर ।
हरे हरे फूल पत्र
दानपेटी डालता
उनके डेहरी पर
अपना सीर झुका कर।
पत्रकार से
नेताजी कहे
जरा मुस्कुराकर ।।
.................
-रमेश

शुक्रवार, 2 मई 2014

गजल- यारब जुदा ये तुझ से जमाना तो है नही

यारब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नही
क्यों फिर भी कहते तेरा ठिकाना तो है नही

कण कण वजूद है तो तुम्हारा सभी कहे
माने भी ऐसा कोई सयाना तो है नही

सुख में भुला पुकारे तुझे दुख मे आदमी
नायाब  उनका कोई बहाना तो है नही

भटके रहे जो माया के पीछे यहीं कहीं
कोई भला खुदा का दिवाना तो है नही

लगता मुझे तो खुद का इबादत ही    ढोंग सा
अपना भी कोई खास    निशाना तो    है नही  

मतपेटी तो बोलेगी , आज मेरे देश में

झूठ और फरेब से, सजाये दुकानदारी ।
व्यपारी बने हैं नेता,  आज मेरे देश में ।।
वादों के वो डाले दाने, जाल कैसे बिछायें है ।
शिकारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
जात पात धरम के, दांव सभी लगायें हैं ।
जुवारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
तल्ख जुबान उनके, काट रही समाज को ।
कटारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।

दामन वो फैलाकर, घर घर तो घूम रहे ।
भिखारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
मंदिर मस्जिद द्वार,  वह माथा टेक रहे ।
पुजारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
मनोहारी करतब, वो तो अब दिखा रहे ।
मदारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।
दंगो के बुझे आग को, फिर वो सुलगा रहे ।
चिंगारी बने हैं नेता, आज मेरे देश में ।।

यक्ष प्रश्न पूछे सभी, युघिष्ठिर नही कोई ।
प्रश्नों के सैलाब बहे, आज मेरे देश में ।।
अपना चेहरा कोई, देख सके भला कैसे ।
धृतराष्ट्र सम नेता, आज मेरे देश में ।।
राजसिंहासन पर, हक अपना अपना ।
जता रहे दल सभी, आज मेरे देश में ।।
शोर करे नेता अभी, जनता साधे मौन है ।
मतपेटी तो बोलेगी , आज मेरे देश में ।।

रविवार, 20 अप्रैल 2014

कहमुकरिया


1.निकट नही पर दूर कहां है ?
उनके नयन सारा जहां है ।
पलक झपकते करते कमाल
क्या सखि साजन ?
न अंतरजाल ।।
2.मित्र न कोई उनसे बढ़कर  ।
प्रेम भाव रखे हृदय तल पर ।।
सीधे दिल पर देते दस्तक ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि पुस्तक ।।
3.हाथ धर उसे अधर लगाती ।
हलक उतारी प्यास बुझाती  ।।
मिलन सार की अमर कहानी ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि पानी ।।
4.रोम रोम वो रमते कैसे ।
कमल पत्र पर जल हो जैसे ।
मिठाई नही बिन मीठापन ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि भगवन ।।
5.जिसके बल पर वह तने खड़े ।
उसके बिन वह डंड सम पड़े ।।
उनके रहते वह तो सजीव ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि न जीव ।।
.............................................
-रमेशकुमार सिंह चैहान

मदिरापान



मदिरापान कैसा है, इस देश समाज में ।
अमरबेल सा मानो, फैला जो हर साख में ।।

पीने के सौ बहाने हैं, खुशी व गम साथ में ।
जड़ है नाश का दारू, रखे है तथ्य ताक में ।।

कुत्ता वह गली का हो, किसी को देख भौकता ।
उनके पास होते जो, उन्ही को देख नोचता ।।

इंसान था भला कैसे, पागल वह हो गया ।
लाभ हानि तजे कैसे, दारू में वह खो गया ।।

किया जो पान दैत्यों सा, मृत्यु को ही पुकारता ।
करे दुश्कर्म जो सारे, वंश को ही उखाड़ता ।।
.............................................
-रमेशकुमार सिंह चैहान

शिखरिणी छंद


जिसे भाता ना हो, छल कपट देखो जगत में ।
वही धोखा देते, खुद फिर रहे हैं फकत में ।।
कभी तो आयेगा, तल पर परिंदा गगन से ।
उड़े चाहे ऊॅचे, मन भर वही तो मगन से ।।

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

गीतिका छंद

प्रेम का मै हू पुजारी, प्रेम मेरा आन है ।
प्रेम का भूखा खुदा भी, प्रेम ही भगवान है ।।
वासना से तो परे यह, शुद्ध पावन गंग है ।
जीव में जीवन भरे यह, प्रेम ही तो प्राण है ।।

पुत्र करते प्रेम मां से, औ पिता पु़त्री सदा ।
नींव नातो का यही फिर, प्रेम क्यो अनुदान है ।।
बालपन से है मिले जो, प्रेम तो लाचार है ।
है युवा की क्रांति देखो, प्रेम आलीशान है ।।

गोद में तुम तो रहे जब से, मां पिता कैसे गढ़े ।
हो गये जो तुम बड़े फिर,  क्यों भला परशान है ।।
वो सुहाने देख सपने, हंै किये तुम को बड़े ।
पूर्ण हो कैसे भला जब, स्वप्न ही अभिमान है ।।

-रमेश चैहान

रविवार, 16 मार्च 2014

होली पर कहमुकरियां



मोहित हुई देख कर सूरत ।
लगे हैं काम की वह मूरत ।।
मधुवन के कहते उसे कंत ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि बसंत ।।1।।

होली पर ही घर को आते ।
बच्चे  पाकर उधम मचाते ।।
करते कोलाहल चितकारी ।
क्या सखि साजन ?
ना पिचकारी ।।2।।

सुंदर दिखे वह गोल मटोल ।
मुस्काय लेत खुशियां टटोल ।।
मेरे पर्वो की वह तो धुरी ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि ना पुरी ।।3।।

प्रतिक्षा में मै नैन बिछाये ।
बारह माह बाद वह आये ।।
धरे रंग रंग के पोटली ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि होली ।।4।।

कहते सभी उसे चित चोर ।
ऊधम करते वह गली खोर ।।
बुझा रहे वह मन की तृष्णा ।
क्या सखि साजन ?
ना सखि कृष्णा

होली गीत (छन्न पकैया छंद)

छन्न पकैया छन्न पकैया, मना रहें सब होरी ।
अति प्यारी सबको लागे है, राधा कृष्णा जोरी ।।1।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, कहे श्याम रास किये ।
 ब्रज नार राधा संग नाचे,  अति पावन प्रेम लिये ।।2।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, क्यो कुछ रिति है खोटी ।
मदिरा भंग से तंग करते, पहचान लगे  मोटी ।।3।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, कीचड़ मुख मलते वह ।
गाली भी क्यों देते ऐसे, मन मारे रहते सह ।।4।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, काम रहित प्रेम धरें ।
मानव हो मानव से साथी,  मानवीय प्रेम करें ।।5।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, आप को बधाईंया ।
माथ स्नेह गुलाल तिलक करूं, करत ताता थईया ।।6।।

शनिवार, 1 मार्च 2014

हिन्दी (छप्पय छंद)

हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, हमारी हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
निज भाषा के साथ, खिले अब माथे बिन्दी ।।
भाषा बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।

नवगीत


1.  
मंदिर मस्जिद द्वार
बैठे कितने लोग
लिये कटोरा हाथ

शूल चुभाते अपने बदन
घाव दिखाते आते जाते
पैदा करते एक सिहरन
दया धर्म के दुहाई देते
देव प्रतिमा पूर्व दर्शन

मन के यक्ष प्रश्‍न
मिटे ना मन लोभ
कौन देते साथ

कितनी मजबूरी कितना यथार्थ
जरूरी कितना यह परिताप
है यह मानव सहयातार्थ
मिटे कैसे यह संताप
द्वार पहुॅचे निज हितार्थ

मांग तो वो भी रहा
पहुचा जो द्वार
टेक रहा है माथ

कौन भेजा उसे यहां पर
पैदा कैसे हुये ये हालात
भक्त सारे जन वहां पर
कोई देता दोष ईश्‍वर
वाह रे मानव करामात

अपने नाते
अपना परिवार
मिले दिल से साथ
2.  
बासंती बयार
होले होले
बह रही है

तड़प रहा मन
दिल पर
लिये एक गहरा घाव
यादो का झरोखा
खोल रही किवाड़
आवरण से ढकी भाव

इस वक्त पर
उस वक्त को
तौल रही है

नयन तले काजल
लबो पर लाली
हाथ कंगन
कानो पर बाली

तेरे बाहो पर
मेरी बदन
झूल रही है

ईश्‍वर की क्रूर नियति
सड़क पर बाजार
कराहते रहे तुम
अंतिम मिलन हमारा
हाथ छुड़ा कर
चले गये तुम

तन पर लिपटी
सफेद साड़ी
हिल रही है

कह मुकरियां


1.  
श्‍याम, रंग मुझे हैं लुभाये ।
रखू नैन मे उसे छुपाये ।
नयनन पर छाये जस बादल ।
क्या सखि साजन ? ना सखि काजल ।
2.  
मेरे सिर पर हाथ पसारे
प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।
कभी करे ना वह तो पंगा ।
क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा
3.  
उनके वादे सारे झूठे ।
बोल बोलते कितने मीठे ।
इसी बल पर बनते विजेता ।
क्या सखि साजन ? ना सखि नेता ।।
4.  
बाहर से सदा रूखा दिखता ।
भीतर मुलायम हृदय रखता ।।
ईश्‍वर भी हो जाये कायल ।
क्या सखि साजन ? न सखि नारियल ।।
5.  
हमेशा मेरे साथ रहते ।
बात सदा करने को कहते ।
उनसे बाते कर करू स्माइल ।
क्या सखि साजन ? ना मोबाइल ।।
-रमेश चौहान

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

गजल-जब से दौलत हमारा निशाना हुआ

जब से दौलत हमारा निशाना हुआ
तब से ये जिंदगी कैद खाना हुआ ।

पैसे के नाते रिश्‍ते दिखे जब यहां
अश्‍क में इश्‍क का डूब जाना हुआ ।

दुख के ना सुख के साथी यहां कोई है
मात्र दौलत से ही जो यराना हुआ ।

स्वार्थ में कुछ भी कर सकते है आदमी
उनका अंदाज अब कातिलाना हुआ ।

गैरो का ऊॅचा कद देखा जब आदमी
छाती में सांप का लोट जाना हुआ ।

रेत सा तप रहा बर्फ सा जम रहा
जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ।

जो खुदा सा इबादत करे पैसो का
या खुदा आपका मुस्कुराना हुआ ।

हाथ फैलाये आना औ जाना है
अब दो गज का ही तो आशियाना हुआ ।

सरस्वती वंदना (गीतिका)

हे भवानी आदि माता, व्याप्त जग में तू सदा ।
श्‍वेत वर्णो से सुशोभित, शांत चित सब से जुदा ।।
हस्त वीणा शुभ्र माला, ज्ञान पुस्तक धारणी ।
ब्रह्म वेत्ता बुद्धि युक्ता, शारदे पद्मासनी ।।

हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्‍व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें ।।

शारदे हे ज्ञान दात्री, मां शरण में लीजिये ।
हम अज्ञानों से भरे है, ज्ञान उर भर दीजिये ।।
धर्म मानवता धरे हम, नष्‍ट दोषो को करें ।
सत्य पथ पर चल सके हम, शक्ति इतना मन भरें ।

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

दोहावली -

दोहावली -
रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय ।
चरित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।।

जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान ।
बन जाओ कुम्हार तुम, कुंभ गढ़ो तब शान ।।

लिखना पढना क्यो करे, समझो तुम सब बात ।
देश धर्म का मान हो, गांव परिवार साथ ।।

पुत्र सदा लाठी बने, कहते हैं मां बाप ।
उनकी इच्छा पूर्ण कर, जो हो उनके आप ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

एक श्रमीक नारी (रोला छंद)

बैठी गिट्टी ढेर, एक श्रम थकीत नारी ।
माथे पर श्रम श्‍वेद, लस्त कुछ है बेचारी ।।
पानी बोतल हाथ, शांत करती वह तृष्‍णा ।
रापा टसला पास, जपे वह कृष्‍णा कृष्‍णा ।।

पी लेती हूॅ नीर, काम है बाकी करना ।
काम काम रे काम, रोज है जीना मरना ।।
मजदूरी से मान, कहो ना तुम लाचारी ।
मिलकर सारे बोझ, ढोय ना लगते भारी ।।

सवाल पापी पेट, कौन ले जिम्मेदारी ।
एक अकेले आप, खीच सकते हो गाड़ी ।।
मिलकर हम घर बार, चलायें साजन मेरे ।
अपना ये परिवार, कहां है केवल तेरे ।।


जीवन है संग्राम, जूझते संघर्षो से ।
सफल होय इंसान, वेद कहते वर्षो से ।।
अराधना है काम, काम ही ईश्‍वर भैय्या ।
पूजे जो निष्‍काम, पार हो जीवन नैय्या ।।

मेरा अपना गांव (रोला छंद)


मेरा अपना गांव, विश्‍व से न्यारा न्यारा ।
प्रेम मगन सब लोग, लगे हैं प्यारा प्यारा ।।
काका बाबा होय, गांव के बुजुर्ग सारे ।
हर सुख दुख में साथ, सखा बन काम सवारे ।।

अमराई के छांव, गांव के छोरा छोरी ।
खेले नाना खेल, करे सब जोरा जोरी ।।
ग्वाला छेड़े वेणु, धेनु धुन सुन रंभाती ।
मुख पर लेकर घास, उठा शिश स्नेह दिखाती ।।

मोहे पनघट नाद, सखी मिल करे ठिठोली ।
गारी देवे सास, करे बालम बरजोरी ।।
चारी चुगली खास, कथा सा सुने सुनावे ।
सभी शोर संदेश, यही से ही बगरावे ।।

गिल्ली डंडा खेल, गली में खेले बच्चे ।
करते झगड़े मेल, सभी है मन के सच्चे ।।
बस्ता थाली हाथ, चले हैं खाने पढ़ने ।
सभी बाल गोपाल, धरे पग जीवन गढ़ने ।।

फसल पके हैं खेत, मोर सा किसान नाचे ।
राहत का ले सांस, कर्मफल अपना जांचे ।।
भरा भरा खलिहान, गांव में लक्ष्मी सोहे ।
खुशी से दमके देह, देव को मानव

सोमवार, 20 जनवरी 2014

दोहावली



अपने समाज देश के, करो व्याधि पहचान ।
रोग वाहक आप सभी, चिकित्सक भी महान ।।

रिश्‍वत देना कोय ना, चाहे काम ना होय ।
बने घाव ये समाज के, इलाज करना जोय ।।

भ्रष्‍टाचार बने यहां, कलंक अपने माथ ।
कलंक धोना आपको, देना मत तुम साथ ।।

रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय ।
च्रित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।।

जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान ।
बन जाओ कुम्हार तुम, कुंभ गढ़ो तब षान ।।

लिखना पढना क्यो करे, समझो तुम सब बात ।
देश धर्म का मान हो, गांव परिवार साथ ।।

पुत्र सदा लाठी बने, कहते हैं मां बाप ।
उनकी इच्छा पूर्ण कर, जो हो उनके आप ।।

छलके थकान अंग पर, कंठ रहा है सूख ।
अधर नीर ले सांस भर, मिटा रही वह भूख ।।

श्रम देवी श्रृंगार कर, धारे आयुध हाथ ।
सृर्जित करने राह नव, पत्थर ढोती माथ ।।

नारी अबला होय ना, घर बाहर है नाम ।
चूल्हा चैका साथ में, करती वह सब काम ।।

संघर्षो से जूझना, भरत वंश पहचान ।
संघर्षो से जूझते, राम बने भगवान ।।

श्रम तो जीवन साध्य है, साधे सकल सुजान ।
श्रमफल मीठा होत है, चख लो आप महान ।।

महिला से जो होय ना, कठिन काज ना कोय ।
करती नारी सब काज अब, नर सम नारी सोय ।।

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-रमेशकुमार सिंह चौहान