सोमवार, 30 दिसंबर 2013

एक तरही गजल-देखा जब से उसे मै दीवाना हुआ

देखा जब से उसे मै दीवाना हुआ
उसको पाना जीवन का निशाना हुआ ।

जब से गैरों के घर आना जाना हुआ
तब से गैरो से भी तो यराना हुआ ।

मुखड़े पर उनकी है चांद की रोशनी
नूर से उनके रोशन यह जमाना हुआ ।

कस्तूरी खुशबू रग रग समाया हुआ
गुलबदन देख गुलशन सुहाना हुआ ।

सादगी की मूरत रूप की देवी वो तो
कोकीला कंठ उनका तराना हुआ ।

प्यार करते नही प्यार हो जाता है
प्यार उनका छुपा इक खजाना हुआ ।

जब से आई तू मेरे जीवन में प्रिये
मेरे धड़कन का तब आना जाना हुआ ।

दिल जवा है जवा ही रहेगा सदा
क्या हुआ जो ये नाता पुराना हुआ ।
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- रमेशकुमार सिंह चैहान

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

हम आजाद है रे (चोका)

कौन है सुखी ?
इस जगत बीच
कौन श्रेष्‍ठ है ?
करे विचार
किसे पल्वित करे
सापेक्षवाद
परिणाम साधक
वह सुखी हैं
संतोष के सापेक्ष
वह दुखी है
आकांक्षा के सापेक्ष
अभाव पर
उसका महत्व है
भूखा इंसान
भोजन ढूंढता है
पेट भरा है
वह स्वाद ढूंढता
कैद में पक्षी
मन से उड़ता है
कैसा आश्‍चर्य
ऐसे है मानव भी
स्वतंत्र तन
मन परतंत्र है
कहते सभी
बंधनों से स्वतंत्र
हम आजाद है रे ।